मंगलवार, 1 अप्रैल 2014

बिल्ली मौसी को अप्रैल -फूल बनाया।



एक थी
छोटी सी चिड़िया
उड़ती रहती
गाँव और शहर की गालियाँ।

एक दिन
देखे उसने
बिखरे दाने बहुत से

दाने चुगने की धुन में
ना देखा उसने
गिरे हैं वो कीचड़ में

खाने  के लालच में
पैर भी धँसवाये
पर भी लिए भिगो

नन्ही सी चिड़िया
घबराई अब तो
 जब देखा सामने
आ रही है बिल्ली मौसी

बिल्ली मौसी भी हर्षाई
मुख पर जीभ लपलपाई
सोचा ,
" अहा ! आज तो दावत
बिन मेहनत  ही पाई !"

चिड़िया थी तो नन्ही
समझदार भी थी बहुत

बोली मौसी
मुझे जरा बाहर निकालो
नहला दो जरा
कीचड़ तुम्हारे मुहं में तो
ना जायेगा

बिल्ली मौसी
अभी तो गीली हूँ मैं !
पानी से भरी
तुमको ना भा सकूंगी
जरा सूखने तो दो !

मूर्ख बिल्ली
बैठी इस आस में
चिड़िया सूखेगी
तब खा जाऊँगी उसे

सूख गए पर चिड़िया के  ...

फड़फड़ाये उसने अपने पर
जा बैठी ऊँची डाली पर
चहकने लगी हो जैसे
बिल्ली मौसी को अप्रैल -फूल बनाया।






शनिवार, 1 मार्च 2014

मम्मा आप चिंता मत करो...

   बच्चे  दो प्रकार के होते हैं। एक तो न पढ़ने वाले और दूसरे वाले ना पढ़ने वाले। यहाँ थोड़ा सा सुधार करते हैं कि कम पढ़ने वाले। पढ़ने वाले बच्चे तो समय पर होमवर्क और रिविज़न करते रहते हैं। और कम पढ़ने वाले बच्चे ! वे सिर्फ परीक्षाओं में ही पढ़ते हैं।
    कम पढ़ने वाले बच्चों में ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ने वाला मेरा छोटा बेटा प्रद्युम्न भी है। आज परीक्षा दे कर आया तो मेरे पूछने पर बताया कि उसके सौ में से 85 नम्बर आ जायेंगे।
 कमाल का आत्म विश्वास ! मुझे सुन कर हंसी आ गई।
   एक तरफ उसके चाचा का बेटा जो कि 8th में ही है। उसकी पहले परीक्षा की  चिंता से और अब रिज़ल्ट की  चिंता से नींद उड़ी  हुई है। यहाँ प्रद्युमन ने खुद ही रिजल्ट निकाल  दिया।
 मुझे याद आया जब वह सातवीं कक्षा में था। मैं बहुत चिंतित थी कि वह कैसे पास हो पायेगा।
  वह प्यार से गले में बाजू डाल कर बोला , " मम्मा आप चिंता मत करो। हमारी सिस्टर ने कहा है कि 33 नंबर वाला पास है। मैं 35 नंबर तो पक्का ले आऊंगा। "
   मुझे हंसी आ गई। सोचा अब सारे  बच्चे तो प्रथम नहीं आ सकते। पढाई के पीछे बच्चे का मासूम बचपन किसलिए खोना। लेकिन चार साल तक होस्टल में भेजना पड़ा इस पढाई के लिए ही !
  अब जब घर में है तो कोई फ़िक्र नहीं है उसे। मुझे तो फ़िक्र है !
   






लेकिन उसे फ़िक्र में नहीं डालना चाहती। कुछ बच्चे 12th के बाद सम्भल जाते हैं। इसी आस में उसके साथ हंस देती हूँ।

सोमवार, 17 फ़रवरी 2014

अनमोल उपहार ( बाल कथा )

      नन्ही सी पीहू चिड़ियों का चहचहाना खिड़की में से देख कर ही खुश हो रही थी । जब से वह अपने चाचा के पास इस बड़े शहर में पढ़ने -रहने आयी है तब से वह इन चिड़ियों को खिड़की में से ही देखा करती है। शहरों में ना पेड़ दिखाई देते है ना ही पंछी। उसे अपने गाँव के हरे -भरे खेत याद  आते और आँगन में लगा नीम का पेड़ भी।
     उसे  हरियाली से , पेड़  -पौधों से बहुत लगाव था। उसने आँगन में कई सारे रंग -बिरंगे फूलों के पौधे लगा रखे थे। जब  वह देखती किसी पौधे में कली खिली है या फूल खिलने वाला है। किलक पड़ती ! फूल , पौधे पर ही नहीं बल्कि उसके भोले से प्यारे से मुख पर भी खिल पड़ते।
     पीहू के पिता गांव में रहते थे। उसके एक भाई और एक बहन गाँव में ही थे। उसके चाचा शहर में नौकरी करते थे। चाचा के कोई संतान नहीं थी।  इस बार गाँव गए तो वे पीहू को साथ ले आये कि उनका अकेला पन भी दूर हो जायेगा और पीहू पढ़ भी लेगी। पीहू के पिता को क्या ऐतराज़ हो सकता था भला। वह सहर्ष मान गए। पीहू गाँव नहीं छोड़ना चाहती थी। उसे अपने फूलों से लगाव था। माँ-बाबा के समझाने पर वह मान तो गई लेकिन मन अपना वहीँ छोड़ आई।


       चाचा का घर तीसरी मंजिल पर था। बाहर निकलो तो चारों और पत्थर के मकान ही नज़र आते। उसका मन कुम्हलाए हुए पौधे कि तरह होने लगा था।  चाचा -चाची बहुत प्यार करते थे। बहुत सारे  खिलौने भी लाकर दिए। वह  खेलती तो थी लेकिन मन बहुत उदास रहता। रात को जब सोती तो अपने पौधों को बहुत याद करती।
 " पीहू ! आओ , स्कूल को देर हो रही है। " चाची ने उसे आवाज़ दी तो वह उदास सी चल पड़ी स्कूल के लिए तैयार होने के लिए।
      चाची ने पीहू को टिफिन पकड़ाते बहुत सारा लाड़ किया। वह चाचा के साथ स्कूल चली गयी।
  दोपहर में जब घर लौटी तो देखा तो सामने उसके बाबा थे।  वह खुश हो कर उनसे लिपट गई। बाबा ने गोद में बैठा लिया। बहुत सारा सामान माँ ने उसके लिए भेजा था। जब उसने अपने पौधों के बारे पूछा तो बाबा हंस पड़े और उसे गोद में उठाये ही बालकनी की  तरफ ले चले। वे उसके लिए एक नन्हा सा पौधा लाये थे। उससे बोले कि इसे वह एक गमले में लगा कर जायेंगे।  वह  ही इसकी देख भाल करेगी। पीहू के चाचा ने एक गमले में इसे लगा दिया।
      पीहू जल्दी से पानी ले आई और गमले में डाल  दिया। अब उसे इंतज़ार था कि कब इसमें फूल खिले लेकिन उसके मुख पर तो फूल खिलने  लग गए थे खुशियों के।

( चित्र गूगल से साभार )

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

टुनिया की सूझबूझ ( बाल कथा )

   माँ कब से आवाज़ लगा रही थी। टुनिया को न जाने  सुनाई दे भी रहा  था भी कि नहीं। रज़ाई में दुबकी  पड़ी थी। उसके दोनों भाई -बहन स्कूल के लिए तैयार हो गए थे। और वह अभी तक उठी ही नहीं थी।
       माँ भी क्या -क्या करे सुबह -सुबह। कितने काम होते हैं। बच्चों को उठाओ। उनके कपड़े निकाल कर दो। फिर उनके टिफिन भी तैयार करो।
    " टुनिया !" माँ अब जोर से बोली।
 टुनिया ने धीरे से आँखे खोली और कहा कि उसके बदन में दर्द है वह उठ ही नहीं पा रही है। माँ ने छुआ तो देखा उसका बदन तो बहुत गर्म था। बुखार हो गया था टुनिया को। माँ ने माथा सहलाते हुए उसे सोये रहने को कहा और उसके भाई -बहन को स्कूल के लिए रवाना कर दिया।
     टुनिया को दवाई दे कर माँ ने उसे सुला दिया। घर के काम में व्यस्त हो गयी। उसे नींद तो नहीं आ रही थी लेकिन बुखार की  वजह से आँखे भी नहीं खुल रही थी। माँ के काम करने कि खटर -पटर उसे सुनायी दे रही थी। माँ शायद बाबूजी के लिए खाना तैयार कर रही थी। उनके ऑफिस जाने  का समय हो रहा था।
   बाबूजी ने ऑफिस के लिए निकलते हुए टुनिया को दुलराया और चल दिए। तभी उसे माँ से कोई जोर से बोलते हुए एक शोर सा सुनाई दिया। उसने ध्यान दिया कि कोई मांगने वाली थी जो उसकी माँ से अनुनय कर रही थी कि वे बहुत भूखी है कुछ खाने को दे दे। उसकी  माँ रसोई में चल दी ,जो रोटी खुद के लिए बनाई थी वे  देने के लिए।
    दरवाज़े पर पहुंची तो कोई नहीं था। जाने कहाँ चली गई वे दोनों औरतें। टुनिया की  माँ बड़बड़ाते हुए लौटी कि अच्छा मज़ाक है पहले मांगती है फिर खुद ही गायब हो गई। उसके पास कोई और काम नहीं है क्या !
  अब तक दवाई का असर होने लगा था। टुनिया बिस्तर छोड़ कमरे से बाहर  आ गई। माँ ने कहा कि वह ड्राईंग -रूम में लेट जाये। वहाँ खिड़की से धूप आएगी तो उसे अच्छा लगेगा। आँगन में तो हवा भी चल रही है।


     वह सोफे पर चुप कर के लेट गई। उसकी आँखे कभी मुंद  रही थी तो कभी खुल रही थी। अचानक उसे सामने की  दूसरी खिड़की पर लगा पर्दा हिलता हुआ दिखा और नीचे दो जोड़ी पैर दिखे। वह घबरा गई।
    वह छोटी तो थी लेकिन इतनी भी नहीं कि समझ ना रखे। वह समझ गयी कि ये हो न हो वो दोनों मांगने वाली औरतें  ही है। माँ जब रोटी लेने गयी तब ये अंदर आ कर पर्दे के पीछे छुप गई होंगी। वह चुपके से उठी और माँ को धीरे से जा कर सब बता दिया। अब माँ भी घबरा गयी।
      टुनिया को  माँ ने  चुप रहने का इशारा करते हुए उसका हाथ पकड़ कर जल्दी से घर के बाहर आ गई। बाहर आकर पड़ोस के लोगों को इकट्ठा किया और सारी  बात बताई।  घर में जा कर माँ ने खिड़की से पर्दा हटा दिया। अचानक पर्दा हटाया तो वे औरतें डर गयी। उनके पास  चाकू और घास काटने वाली दरांती बरामद हुई।
      पुलिस उन औरतों को हिरासत में लेते हुए आस-पास खड़े सभी लोगों से सावधान रहने का सबक देते हुए चल पड़ी।  और टुनिया की बहुत  सराहना की कि उसकी सूझबूझ से एक लुटेरा गिरोह को पकड़वाने में बहुत मदद की है। सभी  टुनिया की सूझबूझ की प्रशंसा कर रहे थे। माँ को अपनी बेटी पर नाज़ हो रहा था।

उपासना सियाग
( चित्र गूगल से साभार )


गुरुवार, 7 नवंबर 2013

बच्चों को अपना हक़ छोड़ना सिखाना चाहिए...

     हमें अपने बच्चों को अपना हक़ छोड़ना सिखाना चाहिए। यहाँ मेरा मतलब बच्चों को प्रतियोगिता में पीछे हटाने से नहीं है बल्कि गला काट प्रतियोगिता से पीछे हटने से है। बच्चे को समझाया जाये कि मेहनत करके आगे बढे ना कि धोखे बाजी से।  आखिर किस्मत भी कोई चीज़ होती है। किसी को छल कर आगे बढ़ा  जाये इससे तो बेहतर है कि वह एक मौके का इंतजार करे। अगर बच्चे की किस्मत में 1000 रूपये हैं तो उन्हें 900 कोई नहीं कर सकता और ना ही 1100 कर सकता है। फिर क्यूँ किसी की बद  दुआ मिले बच्चे को।
    इतिहास गवाह है कि कोई किसी से छल करने वाला आगे नहीं बढ़ पाया। हम सबसे अच्छा उदाहरण महाभारत से सीख सकते है। सत्यवती को देवव्रत ( भीष्म ) ने अपना राज्य और हक़ दोनों प्रदान किये। लेकिन क्या सत्यवती की संताने राज्य सुख ले पाई। सत्यवती के पुत्रों से लेकर उसके पोत्रों और उनकी संतानों तक कोई भी राज्य सुख , सुख और शांति से जीवन नहीं बिता पाई। वहीं  हम देखते हैं देवव्रत से बने भीष्म ही राज सँभालते रहे। चाहे वह राज गद्दी पर ना बैठे हों।
    सबसे बड़ी बात यह भी कि किसी का हक़ छीन कर कोई मानसिक रूप से शांति भी नहीं प्राप्त कर सकता। 

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

क्या हमेशा लड़के गलत ही होते हैं....

"क्या हमेशा लड़के गलत ही होते हैं.. ! "
 कल मैं सोच में पड़  गयी जब मेरे बेटे और भान्जे ने स्कूल से भुनभुनाते हुए एक घटना बतलाई।
     वे दोनों १७ वर्षीय हैं। मेरा बेटा प्रद्युमन ग्यारहवीं में और भांजा केशांत बारहवीं में पढ़ता है। एक साथ स्कूल जाते  हैं और साथ ही आते हैं। हर रोज 12 बजे तक आ जाते हैं। कल 1 बजने को आया तो मैंने फोन किया कि वे दोनों कहाँ रह गए।  बेटे ने कहा कि कार में किसी ने स्कूटी लगा दी तो कार की नम्बर प्लेट ठीक करवा रहे हैं। मेरा दिल ही  डूब गया कि जरुर कार तेज़ चला रहे होंगे और किसी को चोटिल भी किया होगा।  मैंने गुस्से में बोला कि आज तुम लोग एक बार घर तो आओ।


   करीब आधे घंटे बाद घर आये तो मेरा चेहरा देख कर बोले कि एक बार हमारी बात सुनो। फिर बताना आप कि हमारी कोई गलती थी भी या नहीं।
केशांत बोला ," मौसी , प्रद्युमन कार चला रहा था। स्कूल से निकले तब कार मोड़ने लगे। सामने से एक लड़की गलत साइड से आ रही थी। मैंने इशारा किया कि रुके। लेकिन उसने तो सोचा की लड़के हैं , छेड़ रहे होंगे। या अपना etitude दिखा रही थी। सीधा कार में ला कर ठोक दिया। "
 " हुंह ! ये लड़कियां क्या समझती है अपने आपको। हुर्र्र हुर्र भाड़ , लो जी कार में ठोक दिया। "प्रधुमन ने मुहं बना कर कहा तो मुझे हंसी आये बिना ना रही।
   फिर मैंने धीरे से कहा कि उस लड़की के चोट तो नहीं लगी कहीं। वो बोले की नहीं वह खड़ी हुई और उठ कर चली गई।  मैंने उनका नैतिक फ़र्ज़ बताते हुए कहा कि तुम लोगों को उसको उठाना चाहिए था।
 " लेकिन हमारी कोई गलती नहीं थी। "दोनों एक साथ बोले।

गुरुवार, 19 सितंबर 2013

कभी नानी सुनाती थी कहानी ...

कभी नानी सुनाती थी
कहानी
एक था राजा , 
एक थी रानी। 

कभी -कभी
लम्बी रातों की भांति ही ,
 होती थी
बहुत लम्बी होती थी
कहानी। 

कहानी 
बहादुर राजकुमार की
और
राक्षस की कैद में बंद
राजकुमारी की। 

सुना करते थे
उठा ले गया राक्षस
राजकुमारी को
एक आस -एक विश्वास होता था
नानी की बातों से ,
बच्चों के मन में 
कि
बहादुर राजकुमार है न !
राजकुमारी बचा ली जाएगी  ,
राक्षस मारा जायेगा। 

आने वाली पीढ़ी की नानी
 क्या सुनाएगी कहानी 

राजा -रानी तो अब भी हैं ,
और
राजकुमारियाँ भी हैं !
 वे अब भी
राक्षसों की कैद में होती है ,
लेकिन
वो बहादुर राजकुमार
ना जाने कहाँ गुम
हो गए हैं। 

राक्षस अब मारे नहीं जाते
 फिरते हैं अट्टहास करते

नानी चुप ही रहेगी तब
शायद
बच्चों को दिला न पायेगी वह
विश्वास
राजकुमारी के बच जाने  का !
अब नानी क्या सुना पाएगी कहानी !
( उपासना सियाग)