रविवार, 17 जुलाई 2016

भूतों का उपहार ( बाल कहानी )

      बहुत पुरानी बात है। सदियों पुरानी तो होगी ही। एक गांव में गोपाल और उसकी माँ रहते थे। उसके पिता का स्वर्गवास हो चुका था। आजीविका के लिए एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा था। उसमें वह और उसकी माँ मौसम के अनुसार सब्जियां उगाते और बेच कर कुछ कमाई कर लेते। लेकिन वह कमाई पर्याप्त नहीं थी।
    गोपाल की माँ चाहती थी कि वह कुछ और काम करे। शहर जाये। अक्सर उसे कहती कि अगर  उसका बापू होता तो उसे कोई चिंता नहीं थी। लेकिन अब वह पंद्रह वर्ष का हो गया है तो उसे भी कुछ मेहनत करके अपनी आमदनी मे बढ़ोतरी  करनी ही चाहिए। एक दिन गोपाल मान ही गया।
    दो-तीन दिन बाद माँ ने गोपाल को चार रोटी, चटनी के साथ बाँध कर दे दी।  गोपाल को शहर जाने के लिये जंगल पार करना पड़ेगा, यह सोच कर माँ ने उसे नसीहतें भी बहुत सारी दी और घर से विदा कर दिया।
     जंगल से गुजरते हुए  दोपहर हो आई। भूख भी लग गई थी।
     वह कोई पानी का  स्रोत देखने  लगा कि कहीं पानी मिल जाये तो वहीँ पेड़ की छावं तले बैठ कर रोटी खा लेगा। तभी कुछ दूरी पर उसे एक कुआं नज़र आया। पास गया तो वहां एक बाल्टी भी लटकी थी। कुएं से पानी निकाल कर हाथ- मुँह धो कर पास ही साफ जगह पर साथ लायी चादर बिछा कर बैठ गया। रोटी की पोटली खोलते हुए सोच रहा था कि पता नहीं आगे कितना रास्ता है कब तक शहर पहुंचेगा। रोटियां तो चार ही थी सारी खाए कि आधी छोड़ दे।
   सोचते -सोचते, खुद से बातें करते जोर - जोर से बोलने लगा, " एक खाऊँ, दो खाऊँ या सारी खा जाऊँ ! "
संयोग वश वहीँ एक पेड़ पर चार भूत रहते थे। गोपाल की बात उनके कानों में पड़ी तो वे चौंक पड़े। वे सभी भयभीत हो गए कि उनको खाने वाला कौन है ये ? सभी गोपाल के आगे खड़े होगये और विनती करने लगे, " अरे भाई ! हमने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा ?  हमें खाने को किसलिए कह रहे हो ? "
        गोपाल भी भयभीत हो गया। सकते में आ गया ! भय से आँखे भींच ली।  लेकिन वह चतुर बालक था, मन ही मन कुछ सोचता हुआ आँखे बंद किये रहा। उसे आँखे बंद किये हुए देख भूत और भी भयभीत हो गए कि  ना जाने क्या मंत्र पढ़ रहा है।
         " देखो भाई ! हम लोग यहाँ शांति से रहते है कोई उत्पात नहीं करते किसी राहगीर को सताते भी नहीं हैं, हम पर रहम करो। "
      " अच्छा ! फिर ठीक है ! " गोपाल आँखे खोलते हुए आवाज़ को गंभीर बनाते हुए बोला।
" तुम  मेरी शहर जाने में सहायता करो। ऐसा कोई रास्ता बताओ जो मुझे जल्दी और अँधेरा होने से पहले पहुंचा सके। " भूतों ने उसे शहर का मार्ग बता दिया। लेकिन उससे पहले उसे एक हांडी  उपहार में दी कि इस में से जितना चाहो और अपनी पसंद का भोजन पा सकोगे। गोपाल को मनपसंद भोजन भी करवाया।
        शहर पहुँचते -पहुँचते शाम हो गई। रात को रुकने के लिए किसी से पूछा तो उसे एक सराय का पता बता दिया। सराय में एक कमरा ले लिया। खाने का पूछा तो उसने मना कर दिया कि उसके पास है। कमरे में जा कर उसे विचार आया कि क्यों ना सराय के मालिक को भी भोजन के लिए बुला लूँ। सराय का मालिक अचम्भित हुआ कि यह फटेहाल सा बालक मुझे क्या भोजन करवाएगा फिर भी उसके कहने पर उसके कमरे में चला गया। गोपाल ने जल्दी से कमरा अंदर से बंद कर लिया तो सराय मालिक भयभीत हो गया।
  " अरे भाई ! दरवाज़ा अंदर से क्यों बंद किया है ! मुझे मारना चाहते हो क्या ? "
" डरो नहीं चाचा ! मेरे पास एक करामाती चीज़ है जिससे मनचाहा खाना मिलेगा। "
" अोह सच में ! "
" हाँ , ऐसे चकित ना होअो ! "
गोपाल ने हांडी निकाली और अच्छे-अच्छे पकवान मँगवा लिया।
" वाह बेटा, ये तो बहुत बढ़िया चीज़ है ! तुम कहाँ से आये हो और कहाँ जाओगे। अपने बारे तो बताया ही नहीं तुमने तो ! "
" चाचा मैं यहाँ, गाँव से कमाई करने आया हूँ। आप मुझे कहीं नौकरी लगवा दोगे ? "
" हाँ -हाँ क्यों नहीं ...., पर तुम जरा सोचो ! इंसान कमाई किसलिए करता है, दो वक्त की रोटी के लिए ? तो तुम्हें क्या जरूरत है कमाई की ? तुम्हारे पास तो ये जादुई हांडी  है, घर जाओ और ऐश करो ! "
  गोपाल को भी बात ठीक लगी। उसने भी अगले दिन अपने गांव वापस जाने का सोचा।
    उधर सराय  मालिक के  मन में लालच आ गया। उसने सोचा कि क्यों ना वह जादुई हांडी चुरा ले। उसने ऐसा ही किया। आधी रात को उसने एक साधारण हांडी से गोपाल की जादुई हांडी बदल दी। सुबह उठने पर गोपाल को हांडी कुछ बदली सी तो लगी पर मन का वहम  जान के ज्यादा विचार नहीं किया।
            गाँव जा कर माँ को सारी  बात बताई और बोला ," माँ , मैं ये जादुई हांडी लाया हूँ..... तुम सारे गाँव को इक्क्ठा करो , हम दावत करेंगे। "
 " लेकिन पहले हम इसे परखेंगे। क्या सच में इसमें से भोजन निकलता भी है ? कहीं गांव वालों के सामने हमारा उपहास ना बन जाये। "
     माँ की बात भी सही थी। दोनों ने हांडी सामने रखी और बैठ गए। अब नकली हांडी से भोजन क्या निकलना था ! माँ बहुत नाराज़ हुई। गोपाल भी हैरान हुआ।  उसने अगले दिन फिर से जंगल में जाने का सोचा। माँ ने समझाया कि ना तो भूतों के चक्कर में पड़ने की  और ना ही शहर जाने की जरूत नहीं है। लेकिन गोपाल आहत था। उसने तो जाने की ठान  ली थी। अगले दिन वह बिना बताये ही चल पड़ा।
            जंगल में वहीँ पहुँच कर जोर -जोर से बोलने लगा...... एक खाऊँ , दो खाऊँ ,तीन खाऊँ या चारों ही खा जाऊँ.....! "
       पेड़ पर स्थित भूतों को जब यह सुनाई  दिया तो वे घबरा कर उसके सामने आकर खड़े हो गए। एक बोला,"  अरे भाई ! अब क्या हुआ ? "
" मुझे नकली हांड़ी देते हो और पूछते भी हो कि क्या हुआ ? " गोपाल नाराज़गी से बोला।
" अच्छा ! यह  कैसे हो सकता है ?  एक भूत बोला।
          गोपाल ने सारी बात बताई। भूतों उसे एक थैला दिया और बोले कि इसमें से जितने चाहो रूपये निकाल सकते हो। थैले में से रूपये निकाल कर भी दिखाए। गोपाल अब और भी खुश हुआ। वह जल्दी से गाँव जाना चाहता था। फिर यह सोच के  रुक गया कि आधे राह तो आ ही गया तो क्यों ना माँ और अपने लिए कुछ कपड़े और कुछ घर का सामान ले जाऊँ।
          पहुँचते-पहुँचते संध्या गई थी। इसलिए पहले वह सीधे सराय पहुंचा। सराय का मालिक थोड़ा  डर सा गया। लेकिन गोपाल के चेहरे पर ख़ुशी देख कर अनजान बन उसका स्वागत किया।
    " अरे भतीजे ! तू कैसे और कहाँ आ गया ? "
" राम-राम चाचा ! आज मैं खरीद दारी करने आया हूँ ! मेरे पास अब रुपयों  की  कमी नहीं है ! " गोपाल ने इस बार भी जादुई थैले के बारे में बता दिया। और सराय मालिक ने उसे भी चुरा लिया।
     अगले दिन गोपाल, थैले की चोरी से अनजान बाजार पहुँच गया। बहुत सारा सामान खरीदा। जब रुपये देने की बारीआई तो थैले में  रूपये नहीं निकले। क्यूंकि वह तो नकली था। दुकानदार ने उसे डाँट कर वहां से निकाल दिया। वह बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। क्रोध भी बहुत आया।
           वह क्रोधित हो जंगल में गया और भूतों वाले पेड़ के पास जा कर हाथ लहरा-लहरा क्रोध में चिल्लाते हुए बोला, " एक खाऊँ ! दो खाऊँ !! तीन खाऊँ !!! या चारों ही खा जाऊं ..........."
    भूत तो घबरा गए ! चारों झट से उसके सामने खड़े  हो गए।
"  अब क्या हुआ ? कल तुम खुशी -ख़ुशी गए थे !"
" तुम सब झूठे हो ! नकली वस्तुएं देकर मुझे बहला देते हो ! कल बाजार में मुझे बहुत अपमानित होना पड़ा था। "
" ना तो हम झूठे हैं और ना ही हमारी कोई भी वस्तू  नकली है ! तुम हमें सारी बात बताओ कि तुम कहाँ जाते हो और  क्या करते हो ? चारों भूत परेशान थे। गोपाल ने सारा घटनाक्रम बता दिया। भूत समझ गए कि यह सारी कारस्तानी सराय के मालिक की है।
    " तुम बहुत साफ दिल के हो गोपाल और भोले भी हो ! इसलिए तुम्हें सराय के मालिक ने ठग लिया है। "
" अब मैं क्या करूँ ?"
" उसे सबक तो सिखाना ही पड़ेगा। इस बार हम तुम्हें एक जादुई रस्सी और एक डंडा देते हैं ! "
      उन्होंने गोपाल को कुछ समझा कर वापिस शहर भेज दिया। उसे वहां देख कर सराय का मालिक चौंक गया। वह कुछ पूछता, इस से पहले ही गोपाल बोल पड़ा।
    " राम-राम चाचा।  आज मैं बहुत ही अद्भुत और चमत्कारी चीज़ लाया हूँ। जल्दी से कमरे में आओ ! "
सराय का मालिक चकित सा उसके पीछे चल पड़ा। गोपाल ने कमरा भीतर से बंद कर लिया। थैले से रस्सी और डंडा निकल लिए।
   " अरे यह क्या लाए हो तुम ? "
" देखो तो सही चाचा .... " फिर उसने रस्सी को आदेश दिया," जाओ इस आदमी को बांध दो ! "
  डंडे को पीटने का आदेश दिया। सराय का मालिक हतप्रभ था। बंधा हुआ था, हिल भी नहीं पा रहा था और ऊपर से चारों तरफ से डंडे की मार पद रही थी। दर्द से बिलबिला के मार का कारण पूछने लगा। उसने डंडे को रुकने का आदेश दिया।
      " यह डंडा मेरे आदेश की पालना करता है। अभी तो मैंने इसे रोक दिया है लेकिन अगर तुम मुझे यह नहीं बताओगे कि तुमने ही मेरी हांड़ी और थैले को चुराया है तो यह फिर से पीटेगा। "
      " नहीं-नहीं और नहीं ! तुम्हारे सामान मैंने ही चुराये थे ....माफ़ कर दो मुझे मुझे खोल दो तो मैं तुम्हें तुम्हारा सामान लौटा दूंगा ! " वह गिड़गिड़ा रहा था।
     गोपाल से उसे खोल दिया। अपना सामान ले कर घर की ओर चल दिया। चलने से पहले अपने और माँ के लिए कपड़े खरीदे और कुछ घर का सामान भी खरीदा।
        गाँव में माँ बे-हाल थी, क्यूंकि वह बिना बताये जो घर से गया था। वह दरवाजे पर ही निढ़ाल बैठी थी। दूर से गोपाल को आता देखा तो जैसे किसी मुरझाए वृक्ष में जान आ गई हो। दौड़ कर गले लगा लिया और रो पड़ी। कुछ देर बार संयत हो कर बहुत नाराज़ भी हुई कि उसे इस तरह नहीं जाना चाहिए था।
       वह भी शर्मिंदा था। उसने माँ को सारी  बात बताई और समझाई।
" माँ हम गाँव में दावत करेंगे ! "
" क्यों ! किसलिए ?"
" अब हम गरीब नहीं रहे। थैले में मनचाहे रूपये और हांडी से भरपूर भोजन पा सकते हैं। और अब मुझे कोई काम करने की भी जरूरत नहीं है। ऐश करेंगे ! "
" नहीं बेटा ! गरीब धन से नहीं , मन से होते हैं !  मेहनत की कमाई से जो सुकून मिलता है वही सच्चा ऐश है। जो तुम जादुई सामान लाये हो उनसे हम दावत नहीं करेंगे बल्कि उनको हम वापस देकर आएंगे। "
" क्यों माँ ! यह तो मुझे भूतों ने उपहार में दिए हैं। "
" ऐसे उपहार किस काम के जो हमें नाकारा बना दे। और सोचो अगर गाँव में किसी को पता चलेगा तो विश्वास कौन करेगा ? लोग तो यही कहेंगे ना कि जरूर ही ये कोई चोरी-डकैती करते होंगे ? "
" हां माँ ! ये तो मैंने सोचा ही नहीं था ! "
" हम लोग थैले से उतना ही रूपया लेंगे, जितने में हमारे घर की छत की मरम्मत हो जाये और खेत के लिए बीज खरीद सकें। "
     माँ की बात सही भी थी। गोपाल मान गया। उन्होंने थैले से जरूरत भर के  कुछ रूपये लिए और सारा सामान भूतों को लौटाने चल दिए। भूत भी माँ की बात और सोच से बहुत प्रसन्न थे। माँ ने उन भूतों को यह वचन भी दिया कि जो रूपये उन्होंने थैले से लिए हैं वे एक तरह से क़र्ज़ है और यह क़र्ज़ वह किसी जरूरतमंद की सहायता करके चुका दिया करेगी ताकि किसी और माँ  बच्चे से बिछुड़ना ना पड़े। गोपाल और उसकी माँ ख़ुशी-ख़ुशी घर की और चल दिए।


उपासना सियाग



        

शुक्रवार, 24 जून 2016

रुनकु की सूझबूझ

    " रुनकु पढ़ ले ! "
रुनक के कमरे से बाहर निकलते ही भोलू चिल्ला उठा, और घर के सभी लोग हंस पड़े। रुनक को भी हंसी आ गई। वह दौड़ कर भोलू के पिंजरे के पास जा पहुंची। हँसते हुए बोली, " भोलू मिट्ठू, छुट्टियों में कोई पढता है क्या ? " आज तो मैं नानी के पास जा रही हूँ।वहां बहुत मज़े करुँगी और पढाई से भी छुट्टी ..... "
    रुनक को पढाई से ज्यादा शरारतों और खेल में रूचि अधिक है। अक्सर उसकी माँ उसे डांटते हुए कहती रहती है तो भोलू भी सीख गया। जैसे ही वह दिखती है एक बार तो कह ही उठता है कि 'रुनकु पढ़ ले '.....
    घर वालों को भी बहुत भाता है मिट्ठू का यूँ चहकना। दो महीने पहले बिल्ली के पंजे से बचा कर उसे पिंजरे में रख लिया गया था। तब से वह रुनक से बहुत हिल-मिल गया। वह भी उससे बतियाती रहती है।
         आज जब रुनक नानी के पास जा रही है तो थोड़ी उदास है कि भोलू बिना मन नहीं लगेगा। उसने उसे साथ ले जाने की थोड़ी सी जिद की थी। परन्तु गर्मी की वजह से मना कर दिया गया।
        रुनक, उसकी माँ और छोटा भाई ट्रैन में बैठ चुके हैं। पापा ने दोनों बच्चों को सख्त हिदायत दी है कि कोई शरारत ना करें। किसी अनजान का दिया हुआ कुछ ना ले और ना ही खाये। रुनक बोली , " पापा आप चिंता ना करें मैं माँ और भाई का ध्यान रखूंगी आप बस मेरे भोलू का ध्यान रखना। " उसके कहने के अंदाज  से माँ-पापा हंस पड़े।
     ट्रैन चल पड़ी। शाम को आठ बजे नानी का शहर आना था।
     रुनक को पढ़ने का बहुत शौक है  वह भी कोई बाल पत्रिका के कर पढ़ने लगी। दोपहर का समय था। खाना खाया हुआ था सभी ऊंघ रहे थे। भाई भी माँ की गोद में सो गया था।
          लगभग चार बजे गाड़ी एक स्टेशन पर रुकी। वहां कुछ यात्री उतरे। कुछ चढ़े भी। एक व्यक्ति उनके डिब्बे में उनके सामने वाली खाली सीट पर आ कर बैठ गया। यहाँ -वहां का जायजा लेने लगा। फिर जोर से हुंकार लगाई।
  " जय बजरंग बली ! जय-जय श्री राम !! "
जोर की हुंकार से लगभग सभी की नींद खुल गई। सबके चेहरे पर खीझ/परेशानी झलक रही थी । थोड़ी देर बाद उसने अपने बैग से एक डिब्बा निकाला। खोल कर सबकेआगे करने लगा कि बजरंगबली ने उसकी बहुत बड़ी मन्नत पूरी की है तो उसने यह प्रसाद चढ़ाया है।सभी हिचक रहे थे। आज -कल प्रसाद में नशीली चीज मिला कर लूट लेने  वारदातें बहुत होती है तो सभी सावधान भी थे। वह आदमी कुछ मायूस सा हो गया।
      उसने कहा ,यह सच है कि आज कल जमाना खराब है। किसी पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन मैं ऐसा नहीं हूँ। सच्चा भक्त हूँ बाबा का। प्रसाद तो जितना बांटा जाये उतना ही अच्छा होता है इसलिए मैं आप सभी को बाँट रहा हूँ। अब मैं आप सब के सामने प्रसाद खा कर दिखाता हूँ।"
        उसने दो पेड़े उठा कर खा लिए। उसके खाने पर लोगों को भी विश्वास हो गया और सबने प्रसाद ले लिया। रुनक बहुत ध्यान से देख रही थी। प्रसाद वाले डिब्बे को दो भागों में बांटा गया था। दोनों हिस्सों में पेड़े रखे हुए थे। लेकिन एक तरफ तो सादे सफ़ेद रंग के पेड़े रखे  थे और दूसरे हिस्से के पेड़ों पर इलाईची के दाने लगे हुए थे। उस व्यक्ति ने खुद तो सादे वाले ही खाये थे और बाकी यात्रियों को इलाईची वाले पेड़े खुद अपने हाथों से ही दिए थे। वह सोच में पड़ गई। उसकी माँ ने तो तीनो का प्रसाद ले कर एक कागज में लपेट कर पर्स में रख लिया। और यात्रियों ने भी लगभग ऐसा ही किया।क्यूंकि विश्वास अब भी नहीं था और बात प्रसाद की थी तो इंकार भी नहीं कर सके। कुछ ने खा लिया।
           रुनक ने अपनी माँ को कान में बताया ," माँ ! बाबा जी गड़बड़ है !"
       " गड़बड़ है ! क्या ? "
    " बाबा जी के प्रसाद के  डिब्बे में दो तरह के पेड़े हैं। उन्होंने खुद तो सादे वाले खाये हैं और हमें इलाईची लगे हुए पेड़े दिए हैं। "
    " अोह , ऐसा है क्या ? अब क्या करें ......."
कहते हुए माँ तो चिंता में पड़ गई। फिर कुछ सोच कर उस व्यक्ति से बोली , भाई जी, थोड़ा प्रसाद और दीजिये। बजरंग बली का प्रसाद है , मेरे मायके में भी सबको दूंगी। "
     "  बिटिया ये तो यहीं खा लो, खोये का बना है खराब हो जायेगा । "
  " आप चिंता मत कीजिये, शाम तक खराब नहीं होगा।"
" अच्छा बहन ये लो तुम और प्रसाद लो। " डिब्बा खोल कर व्यक्ति ने इलाईची लगे पेड़े देने लगा।
" जरा रुकिए भाई जी ! यहाँ दो तरह के पेड़े रखे हैं। "
" हां तो क्या हुआ !हलवाई ने ऐसे ही बनाए होंगे। "
" फिर आपने खुद सफ़ेद वाले और सबको इलाईची लगे पेड़े क्यों दिए ?"
" अरे बहन शक की भी हद होती है ! " वह नाराज सा होने लगा। अब तो सभी यात्रियों ने अपने पेड़े सम्भाले। जिन्होंने खा लिए थे वो उनींदे से हो रहे थे। उनको भी रुनक की माँ की बात सही लगी। उनमे से एक यात्री बोला ," भाई नाराज क्यों हो रहा है। एक इलाईची वाला पेड़ा तूँ भी खा ले। सबको विश्वास हो जायेगा कि तू गलत नहीं है। "
      वह व्यक्ति बगलें झाँकने लगा और उठ कर जाने के लिए यहाँ -वहां ताकने लगा।अब तक तो सब समझ गए कि ये तो  गड़बड़ बाबाजी ही हैं। उसे वहीं घेर के बैठ गए।
   " बहनजी आपकी सूझबूझ ने हमें  ऐसे शातिर बदमाश की जालसाजी से बचा लिया। "
" यह मेरी नहीं मेरी बिटिया रुनकु की सूझबूझ है इसी ने मुझे बताया। " रुनक की बहुत तारीफ हो रही थी कि आजकल के बच्चे बहुत समझदार होते हैं। इनकी बहुत पैनी नज़र होती है। माँ को बहुत गर्व महसूस हो रहा था। अगले स्टेशन पर उस तथाकथित बाबा जी को पकड़वा दिया गया ।

उपासना सियाग 

गुरुवार, 10 मार्च 2016

जो पढ़ो वह गुनो भी..

     सर्दियों की छुट्टियां होने से पहले सभी शिक्षकों की मीटिंग बुलाई गई। मीटिंग में प्रधानाध्यापक जी बोले कि इस  बार छुट्टियों में बच्चों को पाठ्य पुस्तकों का गृह कार्य ना दे कर कोई रचनात्मक कार्य दिया जाये। एक जनवरी से सात जनवरी तक सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जाता है। ऐसे में बच्चों को इस बारे में कुछ सामग्री एकत्रित करके लाने को कहा जाये। जैसे, कविता, कहानी, चार्ट  या सुरक्षा के नियमों की जानकारी आदि कुछ भी, जिस से बच्चों को सही जानकारी मिले और भविष्य में सावधानी भी रख सकें। सभी को यह प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा।
        स्कूल की छुट्टी होने से पहले आखिरी के दो पीरियड में क्रिसमस मनाने के लिए बच्चे सभागार में एकत्रित हुए तो उनको  जानकारी दी और सभी बच्चों के लिए यह अनिवार्य है। बच्चे खुश थे कि उबाऊ होमवर्क से तो छुटकारा मिला। अब स्कूल दो जनवरी को लगना था।
        टुनिया घर पहुँचते ही दादा जी के पास पहुंची।
     " अरे, आगई मेरी सोन चिरैया !"
    " हाँ जी दादा जी। "
" छुट्टियाँ हो गई होगी अब तो !"
    " हो गई, दादा जी ! एक ख़ुशी की बात है कि इस बार होमवर्क नहीं मिला !"
" बहुत अच्छी बात है बिटिया, दूसरी कक्षा में पढ़ती हो और इतना सारा पढाई का बोझा !" दादी ने कहते हुए अपने दोनों हाथ फैला दिए। टुनिया भाग के दादी की गोद में चढ़ गई।
" अच्छा ! होमवर्क नहीं दिया तो क्या कहा है ? छुट्टियों में कोई विशेष करने को कहा है क्या ?"
" मालूम नहीं दादा जी, ये देखिये डायरी, इसमें ही कुछ लिखा है। "
" ओह्हो ! यह तो बहुत अच्छा काम दिया है ! सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने के लिए कोई सामग्री तैयार कर के लानी है। सड़क पर चलते तो सभी है लेकिन चलने के नियम किसी को पता है या नहीं कौन जानता है। ऐसी बातें बच्चों को स्कूल के समय से ही मालूम होना चाहिए बल्कि मैं तो कहता हूँ कि हर स्कूल में एक सप्ताह में ऐसा ही पीरियड होना चाहिए जिस से बच्चों को सड़को पर चलने के नियम पता हो, देश के प्रति उनके नैतिक दायित्व क्या है!"
" आप को तो भाषण देने की आदत है, मौका मिलना चाहिए !"
" यह भाषण नहीं है ! यह जिम्मेदारी है हम सबकी और हर कोई ही यह भूले हुए है !"
  " अच्छा चलो टुनिया तुम खेलो। मैं तुम्हें एक कविता सिखाऊंगा। "
         छुट्टियाँ बहुत मज़े से बीत गई। छुट्टी के बाद स्कूल का पहला दिन और नए साल का भी पहला दिन। बच्चों से अगले दिन अपने -अपने कार्य के साथ आने  गया।
        हॉल में चार्ट सजा दिए गए थे। एक तरह से प्रदर्शनी सी लगी थी। स्टेज़ पर प्रधानाध्यापक जी और सभी शिक्षक बैठे थे। बच्चे एक -एक कर के अपने विचार  कहानियां, लेख और कवितायेँ सुना रहे थे। टुनिया की बारी आने वाली थी। उसका दिल धक् -धक् कर रहा था। कुछ ही देर में निहारिका नाम पुकारा गया। यह टुनिया का स्कूल में  नाम था।वह  स्टेज पर खड़े हो कर एक बार तो सहम सी गई। फिर दादा जी की बात याद आई कि जब माईक के आगे खड़ी होगी तो एक बार तो घबराहट जरूर होगी, क्यूंकि यह पहली बार है।  तब उसे यह सोचना चाहिए की वह अपने घर में ही है और अपने परिवार लोगों को सुना रही है।  यही किया उसने। सबको अभिवादन कर के अपनी कविता सुनाने लगी।
               " जब भी तुमको पैदल चलना
                 बीच सड़क पर कभी ना चलना।
 
                 सड़क किनारे बनी जो पगडण्डी
                 उसी पर रखना अपनी हदबंदी।

                पार सड़क पर जब भी जाना
                 दायें -बाएं नज़र दौड़ा कर
                 जेब्रा क्रॉसिंग पर ही चलना। "

          टुनिया की छोटी सी लेकिन सीख भरी कविता पर देर तक तालियां बजती रही। फिर अध्यापकों ने भी विचार रखे बच्चों को समझाया की किस तरह से सुरक्षित रहें। अंत में प्रधानाध्यापक जी ने सभी के प्रयासों की सराहना की। यह कोई प्रतियोगिता तो थी नहीं कि किसी एक को सर्वश्रेष्ठ ठहराया जाता।  ज्ञानवर्धक और शिक्षाप्रद कार्यक्रम था जो कि बच्चों को जागरूक करने के लिए आयोजित किया गया था। सफल भी रहा या नहीं यह नहीं कहा जा सकता। क्यूंकि जब तक किसी ज्ञान को अपने जीवन में क्रियान्वित ना किया जाये वह अधूरा ही रहेगा।
          शाम को टुनिया दादा जी के साथ पास के पार्क में जाने को तैयार हुई। चलते -चलते दादा जी की ऊँगली छुड़ा कर सड़क पर भागते हुए अपने दोनों हाथ जैसे हवा में उड़ाते हुए अपनी कविता गाने लगी कि सामने से एक कार  उसे बचाते हुए करीब से गुजर गई। दादा जी ने खींच कर गले लगा लिया। एक बार तो कलेजा मुहँ को हो आया था। दादा जी ने समझ लिया की टुनिया ने कविता सिर्फ याद की है अभी समझी नहीं है। उन्होंने निश्चय किया कि  आज वह टुनिया को समझायेंगे भी कि जो पढ़ो वह गुनो भी। उसका हाथ अच्छे से पकड़ कर पार्क की ओर चल पड़े।

उपासना सियाग ( अबोहर )
                

बुधवार, 18 फ़रवरी 2015

कौतुहल..

 " माँ , आप मंदिर क्यों जाते हो ? "
 " भगवान के दर्शन करने। मन शांत होता है। तुम सब के लिए दुआ मांगने भी जाती हूँ। "
" फिर आपने ,घर में जो अलमारी में मंदिर बना रखा है , उसमें  पूजा क्यों करते हो ? क्यों हाथ जोड़ कर दुआ मांगते हो ? यह तो हम घर में भी तो कर सकते हैं !"
" और सुनो माँ !! कहाँ जा रही हो ? मेरी बात तो पूरी सुनो ! "
" जब भगवान सभी जगह मौजूद है तो फिर मंदिर जाने की क्या जरूरत है ? "
" देखो बेटा ! यह सही है कि भगवान सभी जगह मौजूद है। लेकिन मंदिर जाने का मतलब है कि हम इंसान अपने घर से निकल कर या कहूँ तो अपने अहंकार से निकल कर उस सर्वशक्तिमान के आगे सर झुकाना है। "

शुक्रवार, 5 सितंबर 2014

थप्पड़

  थप्पड़

आज शिक्षक दिवस पर बच्चों ने बहुत सारे कार्यक्रम किये। जिनमें से एक में बच्चों नें हम सभी अध्यापकों के पढाने के तरीके पर अभिनय किया। बहुत हंसी आयी और पता चला कि हम कैसे और किस तरह से बच्चों को पढाते हैं। बच्चे सच में बहुत पारखी नज़र रखते हैं। एक छोटी सी नाटिका भी थी ," थप्पड़ ",जिसमें दिखाया गया था कि बच्चों पर हाथ उठा दिए जाने पर किस तरह से माता-पिता स्कूल में आकर एक शिक्षक को शिकायत करतें है या ज़लील करते हैं।
      इस नाटिका ने मुझे कई बरस पीछे धकेल दिया।  सहसा मेरा हाथ मेरे गाल पर चला गया। मेरी अध्यापिका उषा जी ने भी तो एक दिन मुझे थप्पड़ मारा था , पूरी कक्षा के सामने। ना केवल थप्पड़ ही बल्कि जोर से चिल्लाई भी , कॉपी भी फाड़ डाली थी। मैं ना रोई ना ही कुछ बोल पायी थी। गाल पर हाथ रखे रही अपमानित सी। घर आई तो माँ ने चेहरे पर नज़र डालते ही कहा की आज कुम्हार की थाप पड़ ही गई गीली मिटटी पर।
      माँ भी परेशान थी मेरे गणित में रूचि ना लेने से ,मेरी असुंदर लिखाई से। अध्यापिका जी और माँ के बहुत कहने पर भी सुधार नहीं था मुझमें। मैं तो दिन - रात उषा जी के स्थानांतरण की मन्नतें माँगा करती थी। भोला मन यह नहीं सोचता था की इनकी जगह जो भी आएँगी वह भी तो पढ़ाएगी ही !
       माँ का विचार था कि शिक्षक एक कुम्हार की तरह ही होता है। जैसे कुम्हार गीली मिटटी को थाप कर नया आकर देता है वैसे ही एक शिक्षक भी बच्चे को नए रूप में ढलता है पढ़ा कर तो कभी थप्पड़ भी लगा कर।
      सच में वह थप्पड़ मेरे लिए एक कुम्हार की थाप की तरह ही था। मैंने खुद को बदलने की कोशिश करनी शुरू कर दी और साल-डेढ़ साल बाद सुलेख प्रतियोगिता में मुझे तीसरा पुरस्कार मिला। उषा जी बहुत प्रसन्न थी। तालियों की गड़गड़ाहट में जब मैं पुरस्कार लेने गई तो मुझ में एक नया आत्मविश्वास था।
     तालियां मेरे कानों में गूंज रही थी नेपथ्य में भी और समक्ष भी , समारोह के समापन की घोषणा हो रही थी। मेरे हाथ अब भी गाल पर और आँखे नम थी।
 
उपासना सियाग




मंगलवार, 2 सितंबर 2014

छोटा राजकुमार और रहस्यमयी तोता

वीरपुर एक बहुत बड़ा राज्य था। वहां के राजा सुमेर सिंह एक कुशल प्रशाशक थे। उन्होंने अलग-अलग क्षेत्रों की देखभाल के लिए मंत्रियों की व्यवस्था कर रखी थी। विशाल सेना थी। जिससे उनकी प्रजा को कोई दिक्कत का सामना ना करना पड़े।
जगह -जगह सरायों का निर्माण करवाया हुआ था। जिससे किसी बाहर  से आने वाले यात्री को परेशानी  का सामना न करना पड़े।
उनके राज्य में अपराधों की संख्या ना के बराबर थी , इसका मुख्य कारण था वहां पर कोई बेरोजगार नहीं था।और दूसरा  कारण था वहां की सशक्त न्याय व्यवस्था जिसके चलते अपराधियों को कड़ा  दंड मिलना।
लेकिन कुछ दिनों से राजा और उनके मंत्री बहुत परेशान  थे।
कारण...?
कारण था , राजा के आम बाग़ से , कई दिनों से आम चोरी हो रहे थे।और कोई सुराग भी नहीं मिल रहा था।राजा ने सभा बुलाई कि  क्या किया जाये...! उसके राज्य में ऐसी किसकी हिम्मत हो गयी जिसको अपनी जान की परवाह ना हो ...
राजा के चार बेटे थे ...
बड़े बेटे वीर सिंह ने कहा , " पिता जी आप चिंता ना करें , आज रात मैं निगरानी रखूँगा बाग़ की , चोर मेरी नज़रों से बच  कर नहीं जायेगा। "
राजा ने अनुमति दे दी।
राज कुमार वीर सिंह ने बाग़ में ऐसी  जगह पर अपनी बैठने की व्यवस्था कर ली जहाँ से उसे हर कोई आने-जाने वाला नज़र आता रहे।
आधी रात हो गयी।
पर ये क्या हुआ ...! अचानक यह कैसी महकी सी हवा चली। और वीर सिंह एक मदहोशी में डूब गया और पता ही नहीं चला उसे कब नींद आ गयी।  सुबह किसी ने उसके चेहरे पर पानी के छींटे मारे तो आँखे खुली। देखा सामने सभी लोग चिंता के मारे उसे घेरे खड़े है। रानी माँ की आँखों से तो आंसूं थम ही नहीं रहे थे।
और वीर सिंह ...?
वो तो बेहद शर्मिंदा था ,एक राज कुंवर हो कर भी एक चोर का पता नहीं लगा पाया। पर उसका कोई कुसूर भी तो ना था।
पर राजा की परेशानी तो वैसे की वैसी ही रही। इस बार मंझले राजकुमार समीर सिंह ने अपने पिता से वादा किया  के वो चोर को पकड़ेगा ...
पर उसके साथ भी वीर सिंह वाला किस्सा हुआ। इसके बाद तीसरे राजकुमार सुवीर सिंह के साथ भी यही किस्सा हुआ।
अब तो राजा बहुत फिक्रमंद हुआ कि  एक चोर को कोई भी नहीं पकड तो क्या कोई सुराग भी नहीं पा सका है।तभी सबसे छोटा राजकुमार जोरावर सिंह कहता है, " महाराज ,आज की रात मुझे  कोशिश करने दी जाये।" राजा ने समझाया भी कि  वह छोटा है। पर उसने जिद की तो राजा को मानना ही पड़ा।
आखिर राजकुमार छोटा था तो क्या हुआ ...! था तो राजसी खून ही , तो हिम्मत भी बहुत थी और समझ भी...
वह भी वही बैठ गया जहा उसके दूसरे  भाई बैठे थे।
जैसे -जैसे मध्यरात्री का समय आ रहा था , राजकुमार और  भी चौकन्ना  हो गया था कि उसे सोना नहीं है। यह बात भी सही है अगर इन्सान दृढ निश्चय कर ले तो बहुत कुछ संभव है उसके लिए।
तो उसने क्या किया ...? जिससे उसे नींद ना आये ...!
उसने अपनी एक ऊँगली को तलवार की धार पर रगड़ कर जख्मी कर लिया। जिससे पीड़ा के कारण उसे नींद ना आये।
अब समय हो आया मध्य रात्री का ...! एक महकी हुई सी हवा चलने लगी पर छोटे  राजकुमार ने तो हवा के विरुद्द रुख कर रखा था। उसने देखा बहुत सारे तोते उड़ते हुए चले आ रहे है।और सभी आम के पेड़ों पर से एक -एक आम चुरा कर भाग रहे हैं। राज कुमार ने भाग कर बड़ी मुश्किल से एक तोते को पकड लिया।
तोते को एक पिंजरे में बंद करके रख लिया गया। अगली सुबह उसे लेकर राजकुमार , राजदरबार में उपस्थित हुआ। वहां पर एक जमघट सा लगा था के एक तोता चोर कैसे हो सकता है।
अब समस्या थी कि  तोते से क्या और कैसे पूछा जाये ...!
तभी तोता मानवीय आवाज़ में बोल पड़ा , " महराज , मुझे मुक्त कर दिया जाय , मैं बेकुसूर हूँ , दूर काली पहाड़ियों पर एक महा राक्षस है हम उसी के गुलाम है। उसी ने हमें अपने माया जाल में बाँध कर यहाँ भेजा था और हमने चोरी की।"
राजा सुमेर सिंह एक दयालु व्यक्ति था। उसने तोते को मुक्त कर दिया।
लेकिन समस्या तो वहीँ की वहीँ ही रही। अब काली पहाड़ियाँ कहाँ थी , किसे मालूम , खोज के लिए किसे भेजा जाए ...! तभी बड़ा राज़  कुमार आगे हो कर अपने जाने की आज्ञा मांगने लगा। और राजा ने अनुमति भी दे डाली।क्यूँ कि वह राजा था और उसकी प्रजा उसकी संतान थी। इसलिए उसने प्रजा या अपनी सेना में से किसी को भेजने के बजाय अपने पुत्र को ही भेजना उचित समझा।
अगले दिन राजकुमार वीर सिंह घोड़े पर सवार हो कर चल दिया। कई दिन तक चलता रहा, पूछता रहा काली पहाड़ियों का पता । एक दिन उसने पाया कि सडक का रास्ता तो ख़त्म हो गया है और आगे घना  जंगल था। उसमे राह ढूंढता हुआ चल ही रहा था। उसे दूर एक बूढी औरत, जिसने  सर पर बड़ा सा लकड़ियों का गट्ठर लिया हुआ था, नज़र आई।
उसने बेरुखी से उसे पुकारा , "ए बुढ़िया ...! जंगल के पार जाने का रास्ता कौनसा है और तूने किन्ही काली पहाड़ियों के बारे सुना है क्या ...?"
पर यह भी क्या बात हुई ...!अब राजकुमार को क्या ऐसे बोलना चाहिए था ...? एक बाहुबली को एक मजबूर और लाचार  के साथ ऐसी वाणी और भाषा में तो नहीं बोलना चाहिए था।
तभी वह बूढी औरत बोल पड़ी , " पहले बेटा  मेरा ये गट्ठर तो उठा कर मेरी झोंपड़ी तक ले चलो ..."
" मुझे इतना समय नहीं है जो मैं फ़ालतू के काम करूँ ...!", राज़ कुमार उपेक्षा से कहता हुआ घोड़े को आगे की तरफ ले चल पड़ा।
बहुत मुश्किल से जंगली जानवरों से बचता कभी लड़ता आखिरकार वह जंगल से पार पहुँच ही गया। आगे विशाल नदी दिखाई पड़  रही थी। अब एक बार फिर से परेशानी में पड़  गया राज़ कुमार। अब क्या किया जाये , सोच में पड़ गया वह। फिर हिम्मत करके आस -पास नज़र दौड़ाई तो वहां एक लकड़ी का  बड़ा सा  चौकोर पटरा सा था। अपने घोड़े को वही छोड़ कर उस पर सवार हो कर नदी भी पार कर ली। आगे एक खुला मैदान आया। वहां पर उसने क्या देखा ...!
उसने देखा के वहां पर असंख्य पत्थर की मूर्तियाँ थी और वो भी इंसानों जैसी। उसे बहुत हैरानी हो रही थी कि  यहाँ वीराने में ये मूर्तियाँ कौन बनता होगा भला ...!
वह चलता रहा लेकिन तभी ....
"ओ राज़ कुमार ...!  कहाँ जा रहे हो , एक बार मुड़  कर तो देखो ...!" कोई पीछे से पुकार रहा था।
राज़ कुमार ने जैसे ही मुड़ कर देखा और वह पत्थर का बन गया।
उधर वीर पुर में सभी चिंता में डूबे  हुए थे। राजकुमार तो बहुत दिन हो गये ना खबर थी और ना ही वापस आया।इस पर राजकुमार समीर सिंह ने जाने की आज्ञा मांगी , उसका कहना था के वह चोर और अपने बड़े भाई दोनों का पता ले कर आएगा।
वह भी चल पड़ा उसने भी उस बूढी औरत की अवहेलना की और आखिरकार वह भी  पत्थर की मूर्ति में बदल गया। ऐसा ही हाल तीसरे राजकुमार का हुआ।
और अब बारी थी छोटे राजकुमार जोरावर सिंह की। पर इस बार राजा भी सहमत नहीं था और ना ही राजा के सलाहकार ... और रानी माँ का भी बुरा हाल था। वह अपने पुत्रों के वियोग में बार-बार गश खा कर गिरती रहती थी। लेकिन जोरावर सिंह अपनी बात पर अटल रहा और आखिर में उसे अनुमति मिल ही गयी।
जोरावर सिंह भी चल पड़ा। उसको भी  वही घना जंगल दिखा और वही सामने आती हुई  बूढी औरत ...!
लेकिन राजकुमार बहुत विनम्र और दयालु था। वह घोड़े से उतरा और बूढी औरत के पास जाकर बोला," माँ , लाओ ये मुझे दो , कितना बोझ है इसमें आपके कैसे उठेगा यह , मुझे बताओ , लाओ मैं इसे रख आता हूँ।"
बूढी औरत ने उसे  गट्ठर थमा  कर अपनी झोपडी की तरफ ले गई।
वहां उसने राजकुमार को पानी और थोडा गुड खाने को दिया जिससे उसके अन्दर एक शक्ति का सा संचार हुआ लगा। जब राजकुमार ने बूढी औरत से अपने भाइयों और काली पहाड़ी के बारे में पूछा तो ...
अचानक उसने क्या देखा ...!
वो बूढी औरत तो एक सुंदर से देवी में बदल गयी। उसने बताया कि  वह " वन-देवी " है। वह ऐसे ही वेश बदल कर लोगों की परीक्षा लेती  और रक्षा भी करती है। क्यूंकि जोरावर बहुत ही नेक इन्सान था इसलिए देवी ने उसकी सहायता करने का निश्चय किया।
देवी ने उसे उसे एक पतली रस्सी का बड़ा सा गोला दिया और कुछ अनाज के दानो की पोटली दी।
और  कहा, " इस गोले का एक सिरा पकड कर इसे जमीन पर छोड़ देना , यह लुढकता हुआ तुमको जंगल पार ले जायेगा। आगे एक नदी आएगी , उसमे तुम यह पोटली के दाने डालते रहना , जिससे नदी में तुम्हारे लिए राह खुद - ब - खुद ही बनता जायेगा। नदी पार कर लोगे तो तुम्हें आगे एक विशाल मैदान नज़र आएगा। उस मैदान में तुम्हें बहुत सारी पत्थर की मूर्तियाँ नज़र आएगी ,वे पत्थर की मूर्तियाँ असल में इंसान ही है। काली  पहाड़ी के राक्षस   ने उसके आसपास एक माया जाल फैला रखा है। जो भी उसके क्षेत्र में प्रवेश करता है तो उसको पीछे से कई सारी आवाजें पुकारने लग जाती है।जो भी मुड़  कर देखता है वही पत्थर हो जाता है। अब तुम यह ख्याल रखना के पीछे मुड़  कर नहीं देखना है। उसके बाद तुम अपने विवेक से काम लेते हुए आगे बढ़ना ..."
राजकुमार को आशीर्वाद दे देवी अंतर्ध्यान  हो गयी।
राजकुमार भी चल पड़ा रस्सी वाले गोले के पीछे-पीछे ...बड़ी सुगमता से जंगल पार कर लिया। अब सामने नदी थी। अपने घोड़े को वहीँ छोड़ कर दानो वाली पोटली से दाने नदी में डालता रहा और नदी भी रास्ता बनाती रही। सामने मैदान और उसमे खड़ी मूर्तियाँ देख वह समझ गया कि अब राक्षस का मायावी क्षेत्र आ गया है।
सामने ही काली पहाड़ी थी।
 राजकुमार आगे बढ़ चला।  उसको भी पुकारा जाने लगा पीछे से । एक बार तो वह ठिठक ही गया जब उसे लगा उसे उसके तीनो भाई पुकार रहें है। पर वह सावधान था ... मन तो भर आया था अपने भाइयों की पुकार पर लेकिन उसने खुद  को दृढ कर लिया था  , उसे मुड़  कर तो देखना ही नहीं है।
अब वह पहाड़ के सामने था। उस पर जाने का रास्ता तो सामने ही था। सोच ही रहा था के ...अचानक धरती में कुछ कंम्पन सा महसूस हुआ और आसमान में गर्जना सी सुनायी दी। सामने से राक्षस चला आ रहा था। राजकुमार को कुछ नहीं सुझा तो वह भाग कर एक पेड़ के पीछे की झाड़ियों में छुप  कर देखने लगा।
राक्षस बहुत विशालकाय था। बड़े- बड़े दांत , नाख़ून  और सर पर सींग और सारे शरीर पर बाल थे। पास से गुज़रा तो भयंकर बदबू  आ रही थी।
उसके जाने के बाद राजकुमार जल्दी से पहाड़ी पर चढने लगा। थोड़ी देर में की एक महल के सामने था। बाहर का दरवाज़ा खुला था। वहां  दरवाज़े पर कोई भी नहीं था और राक्षस को जरूरत भी क्या थी।उसने  अपनी माया ही ऐसी फैला रखी थी कोई उसके महल तक जा ही नहीं सकता था।
अंदर जा कर उसने देखा , बहुत सुन्दर दृश्य था वहां पर बहुत सारे  कक्ष थे हर कक्ष  की सज्जा दर्शनीय थी।लेकिन एक कक्ष के पास से गुज़रा तो उसे धीरे - धीरे रोने की आवाज़ सुनाई दी तो वह रुक गया और जहाँ से रोने की आवाज़ आ रही थी उस कक्ष की तरफ बढ़ चला। एक बार तो उसने सोचा कहीं ये भी कोई राक्षस की माया ना हो।फिर भी वह हिम्मत करके भीतर की ओर बढ़ा।
देखा एक सुंदर सी लड़की रोये जा रही थी।उसे देख कर घबरा कर खड़ी हो गयी। राजकुमार ने उसे डरने को मन करते हुए अपनी सारी कहानी  बताई।
लड़की ने बताया ,वह सुंदर नगर की राजकुमारी फूलमती  है। राक्षस ने उसके पिता से कोई शर्त लगाई थी और राजा शर्त हार गए तो उसके बदले राक्षस उसे उठा लाया। राजकुमार से हैरान हो कर वह बोली ," तुम यहाँ क्या करने आये हो राक्षस आते ही तुमको खा जायेगा।"
पर राजकुमार तो राक्षस को मार कर उसका आतंक खत्म करने आया था। वह फूलमती से महल और राक्षस का राज़  पूछने लगा।
राजकुमारी भी क्या बताती। वह तो जब आयी थी सिवाय रोने के अलावा कुछ भी नहीं किया था।उसने राजकुमारी के साथ महल में घूमना शुरू कर दिया।उन्होंने देखा सभी कक्ष खुले हैं। एक कक्ष पर छोटे -छोटे सात ताले एक क़तर में क्रमवार लगे थे, देख कर दोनों हैरान से हुए। फिर दोनों ने एक योजना बनाई।
कुछ देर बाद जब राक्षस आया तो चकित रह गया ...! राजकुमारी रो नहीं रही थी बल्कि बाहर खड़ी थी।राक्षस के पूछने पर उसने बताया कि  जब उसे वहीँ रहना है तो वह मन लगाने की कोशिश कर रही है। इसके बाद वह धीरे - धीरे राक्षस से   घुलने मिलने भी लगी। एक दिन बातों ही बातों  में वह पूछ बैठी राक्षस से , " तुम कितने वीर हो और बहुत मायावी भी तो तुम्हें तो कोई मार ही नहीं सकता।"
राक्षस शरीर से बलशाली पर बुद्धि से जड़ ...!बोल पड़ा , " हाँ मुझे कोई मार नहीं सकता क्यूंकि मेरी जान तो एक तोते में बसी है ,उस तोते को मैंने मेरे बाग़ में छुपा कर रखा है। इस महल में एक कक्ष है उस  पर मैंने सात ताले लगा रखे हैं। उसमे भी सात कमरे है उसके बाद एक बाग़ है उसमे एक आम के पेड़ पर एक पिंजरे में तोता है अगर उसे कोई मार दे तो ही मैं मर सकता हूँ ...! लेकिन चाबी सदैव मेरे पास ही रहती है।"
राजकुमार छुप कर सारी  बात सुन रहा था।
अब सिर्फ चाभी ही हासिल करनी थी राजकुमार ने , मंजिल तो उसके सामने ही थी। और यह भी संयोग ही था के महीनो ना नहाने वाला राक्षस उस दिन नहाने चला गया। उसके जाते ही फूलमती ने चाबी उठा कर राजकुमार को दे दी। राक्षस को  राजकुमारी  ने बातों में उलझा लिया। और बातों ही बातों में राक्षस चाबी को भूल ही गया। महल से बाहर  भी  चला गया।
उसके जाते ही बिना मौका गवांये वे दोनों बंद कक्ष के सामने थे। एक -एक कर के ताले खोलने लगे। सातवे ताले को खोल ही रहे थे के राक्षस महल में आ पहुंचा। राक्षस को थोड़ी दूर जाते ही चाबी की याद आ गयी थी।अब एक तरफ तो राक्षस आगे की और बढ़ रहा था।दूसरी तरफ वे दोनों ताला खोल चुके थे। और भागते हुए आगे जो क्रमवार कमरे बने थे उनके दरवाज़े धकेल कर खोलते हुए आगे भागते हुए जा रहे थे।
राक्षस के क्रोध की पारावार ही नहीं थी। उसके क़दमों से धरती और हुंकार से आकाश भी काँप  रहा था।वो बढ़ा चला जा रहा था।
तब तक वे दोनों बाग़ में पहुँच चुके थे। अब तलाश थी उनको तोते की ...! उस आम के पेड़ की जिस पर तोता था ...!
तभी सामने उनको पिंजरे में तोता दिख गया।
" नहीं ...!" राक्षस जोर से दहाडा।
" उसे हाथ मत लगाना ...!"राक्षस फिर दहाडा ...
लेकिन राजकुमार ने तोते को हाथ में ले लिया था और उसने तोते की एक टांग मरोड़ दी।
राक्षस एक टांग से लंगड़ा हो गया। फिर तोते की दूसरी टांग मरोड़ी और राक्षस नीचे गिर पड़ा लेकिन हाथों के सहारे रेंगता आगे बढ़ गया।
राजकुमार ने तोते का एक पंख मरोड़ दिया तो राक्षस का एक हाथ टूट गया। दूसरा पंख मरोड़ा तो दूसरा हाथ टूट गया।
और आखिर में तोते की गर्दन मरोड़ी तो राक्षस निढाल हो कर गिरा और मर गया।
उसके मरते ही उसका माया जाल भी खत्म हो गया। बाग़ के पेड़ों पर बैठे  सभी तोते उड़ गए उन्मुक्त हो कर आसमान में।
काली पहाड़ी भी अपने असली स्वरूप में आ कर  अपनी सुनहरी आभा से चमक रही थी।
जितने भी लोग मूर्तियों में बदले हुए थे वे सभी  फिर से इन्सान बन गए थे। राजकुमार अपने भाइयों से मिल कर बहुत ही खुश हुआ। जोरावर सिंह ने अपने भाइयों को  राजकुमारी का परिचय दिया और बताया अगर फूलमती  का सहयोग नहीं मिलता तो  राक्षस का मारा जाना संभव नहीं था।
फिर सभी वीर पुर की ओर चल पड़े। वहां पर सभी का बहुत भव्य स्वागत हुआ। राजकुमारी फूलमती के पिता राजा सुंदर सेन को भी बुलाया गया और राज़ कुमारी को उनके साथ विदा कर दिया।
इसके बाद वहां पर कोई भी अपराध नहीं हुआ सभी  सुख -चैन के साथ रहे।

उपासना सियाग






शुक्रवार, 20 जून 2014

कभी नानी सुनाती थी कहानी

कभी नानी सुनाती थी
कहानी
एक था राजा , 
एक थी रानी। 

कभी -कभी
लम्बी रातों की भांति ही ,
 होती थी
बहुत लम्बी होती थी
कहानी। 

कहानी 
बहादुर राजकुमार की
और
राक्षस की कैद में बंद
राजकुमारी की। 

सुना करते थे
उठा ले गया राक्षस
राजकुमारी को
एक आस -एक विश्वास होता था
नानी की बातों से ,
बच्चों के मन में 
कि
बहादुर राजकुमार है न !
राजकुमारी बचा ली जाएगी  ,
राक्षस मारा जायेगा। 

आने वाली पीढ़ी की नानी
 क्या सुनाएगी कहानी 

राजा -रानी तो अब भी हैं ,
और
राजकुमारियाँ भी हैं !
 वे अब भी
राक्षसों की कैद में होती है ,
लेकिन
वो बहादुर राजकुमार
ना जाने कहाँ गुम
हो गए हैं। 

राक्षस अब मारे नहीं जाते
 फिरते हैं अट्टहास करते

नानी चुप ही रहेगी तब
शायद
बच्चों को दिला न पायेगी वह
विश्वास
राजकुमारी के बच जाने  का !
अब नानी क्या सुना पाएगी कहानी !