रविवार, 17 जुलाई 2016

भूतों का उपहार ( बाल कहानी )

      बहुत पुरानी बात है। सदियों पुरानी तो होगी ही। एक गांव में गोपाल और उसकी माँ रहते थे। उसके पिता का स्वर्गवास हो चुका था। आजीविका के लिए एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा था। उसमें वह और उसकी माँ मौसम के अनुसार सब्जियां उगाते और बेच कर कुछ कमाई कर लेते। लेकिन वह कमाई पर्याप्त नहीं थी।
    गोपाल की माँ चाहती थी कि वह कुछ और काम करे। शहर जाये। अक्सर उसे कहती कि अगर  उसका बापू होता तो उसे कोई चिंता नहीं थी। लेकिन अब वह पंद्रह वर्ष का हो गया है तो उसे भी कुछ मेहनत करके अपनी आमदनी मे बढ़ोतरी  करनी ही चाहिए। एक दिन गोपाल मान ही गया।
    दो-तीन दिन बाद माँ ने गोपाल को चार रोटी, चटनी के साथ बाँध कर दे दी।  गोपाल को शहर जाने के लिये जंगल पार करना पड़ेगा, यह सोच कर माँ ने उसे नसीहतें भी बहुत सारी दी और घर से विदा कर दिया।
     जंगल से गुजरते हुए  दोपहर हो आई। भूख भी लग गई थी।
     वह कोई पानी का  स्रोत देखने  लगा कि कहीं पानी मिल जाये तो वहीँ पेड़ की छावं तले बैठ कर रोटी खा लेगा। तभी कुछ दूरी पर उसे एक कुआं नज़र आया। पास गया तो वहां एक बाल्टी भी लटकी थी। कुएं से पानी निकाल कर हाथ- मुँह धो कर पास ही साफ जगह पर साथ लायी चादर बिछा कर बैठ गया। रोटी की पोटली खोलते हुए सोच रहा था कि पता नहीं आगे कितना रास्ता है कब तक शहर पहुंचेगा। रोटियां तो चार ही थी सारी खाए कि आधी छोड़ दे।
   सोचते -सोचते, खुद से बातें करते जोर - जोर से बोलने लगा, " एक खाऊँ, दो खाऊँ या सारी खा जाऊँ ! "
संयोग वश वहीँ एक पेड़ पर चार भूत रहते थे। गोपाल की बात उनके कानों में पड़ी तो वे चौंक पड़े। वे सभी भयभीत हो गए कि उनको खाने वाला कौन है ये ? सभी गोपाल के आगे खड़े होगये और विनती करने लगे, " अरे भाई ! हमने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा ?  हमें खाने को किसलिए कह रहे हो ? "
        गोपाल भी भयभीत हो गया। सकते में आ गया ! भय से आँखे भींच ली।  लेकिन वह चतुर बालक था, मन ही मन कुछ सोचता हुआ आँखे बंद किये रहा। उसे आँखे बंद किये हुए देख भूत और भी भयभीत हो गए कि  ना जाने क्या मंत्र पढ़ रहा है।
         " देखो भाई ! हम लोग यहाँ शांति से रहते है कोई उत्पात नहीं करते किसी राहगीर को सताते भी नहीं हैं, हम पर रहम करो। "
      " अच्छा ! फिर ठीक है ! " गोपाल आँखे खोलते हुए आवाज़ को गंभीर बनाते हुए बोला।
" तुम  मेरी शहर जाने में सहायता करो। ऐसा कोई रास्ता बताओ जो मुझे जल्दी और अँधेरा होने से पहले पहुंचा सके। " भूतों ने उसे शहर का मार्ग बता दिया। लेकिन उससे पहले उसे एक हांडी  उपहार में दी कि इस में से जितना चाहो और अपनी पसंद का भोजन पा सकोगे। गोपाल को मनपसंद भोजन भी करवाया।
        शहर पहुँचते -पहुँचते शाम हो गई। रात को रुकने के लिए किसी से पूछा तो उसे एक सराय का पता बता दिया। सराय में एक कमरा ले लिया। खाने का पूछा तो उसने मना कर दिया कि उसके पास है। कमरे में जा कर उसे विचार आया कि क्यों ना सराय के मालिक को भी भोजन के लिए बुला लूँ। सराय का मालिक अचम्भित हुआ कि यह फटेहाल सा बालक मुझे क्या भोजन करवाएगा फिर भी उसके कहने पर उसके कमरे में चला गया। गोपाल ने जल्दी से कमरा अंदर से बंद कर लिया तो सराय मालिक भयभीत हो गया।
  " अरे भाई ! दरवाज़ा अंदर से क्यों बंद किया है ! मुझे मारना चाहते हो क्या ? "
" डरो नहीं चाचा ! मेरे पास एक करामाती चीज़ है जिससे मनचाहा खाना मिलेगा। "
" अोह सच में ! "
" हाँ , ऐसे चकित ना होअो ! "
गोपाल ने हांडी निकाली और अच्छे-अच्छे पकवान मँगवा लिया।
" वाह बेटा, ये तो बहुत बढ़िया चीज़ है ! तुम कहाँ से आये हो और कहाँ जाओगे। अपने बारे तो बताया ही नहीं तुमने तो ! "
" चाचा मैं यहाँ, गाँव से कमाई करने आया हूँ। आप मुझे कहीं नौकरी लगवा दोगे ? "
" हाँ -हाँ क्यों नहीं ...., पर तुम जरा सोचो ! इंसान कमाई किसलिए करता है, दो वक्त की रोटी के लिए ? तो तुम्हें क्या जरूरत है कमाई की ? तुम्हारे पास तो ये जादुई हांडी  है, घर जाओ और ऐश करो ! "
  गोपाल को भी बात ठीक लगी। उसने भी अगले दिन अपने गांव वापस जाने का सोचा।
    उधर सराय  मालिक के  मन में लालच आ गया। उसने सोचा कि क्यों ना वह जादुई हांडी चुरा ले। उसने ऐसा ही किया। आधी रात को उसने एक साधारण हांडी से गोपाल की जादुई हांडी बदल दी। सुबह उठने पर गोपाल को हांडी कुछ बदली सी तो लगी पर मन का वहम  जान के ज्यादा विचार नहीं किया।
            गाँव जा कर माँ को सारी  बात बताई और बोला ," माँ , मैं ये जादुई हांडी लाया हूँ..... तुम सारे गाँव को इक्क्ठा करो , हम दावत करेंगे। "
 " लेकिन पहले हम इसे परखेंगे। क्या सच में इसमें से भोजन निकलता भी है ? कहीं गांव वालों के सामने हमारा उपहास ना बन जाये। "
     माँ की बात भी सही थी। दोनों ने हांडी सामने रखी और बैठ गए। अब नकली हांडी से भोजन क्या निकलना था ! माँ बहुत नाराज़ हुई। गोपाल भी हैरान हुआ।  उसने अगले दिन फिर से जंगल में जाने का सोचा। माँ ने समझाया कि ना तो भूतों के चक्कर में पड़ने की  और ना ही शहर जाने की जरूत नहीं है। लेकिन गोपाल आहत था। उसने तो जाने की ठान  ली थी। अगले दिन वह बिना बताये ही चल पड़ा।
            जंगल में वहीँ पहुँच कर जोर -जोर से बोलने लगा...... एक खाऊँ , दो खाऊँ ,तीन खाऊँ या चारों ही खा जाऊँ.....! "
       पेड़ पर स्थित भूतों को जब यह सुनाई  दिया तो वे घबरा कर उसके सामने आकर खड़े हो गए। एक बोला,"  अरे भाई ! अब क्या हुआ ? "
" मुझे नकली हांड़ी देते हो और पूछते भी हो कि क्या हुआ ? " गोपाल नाराज़गी से बोला।
" अच्छा ! यह  कैसे हो सकता है ?  एक भूत बोला।
          गोपाल ने सारी बात बताई। भूतों उसे एक थैला दिया और बोले कि इसमें से जितने चाहो रूपये निकाल सकते हो। थैले में से रूपये निकाल कर भी दिखाए। गोपाल अब और भी खुश हुआ। वह जल्दी से गाँव जाना चाहता था। फिर यह सोच के  रुक गया कि आधे राह तो आ ही गया तो क्यों ना माँ और अपने लिए कुछ कपड़े और कुछ घर का सामान ले जाऊँ।
          पहुँचते-पहुँचते संध्या गई थी। इसलिए पहले वह सीधे सराय पहुंचा। सराय का मालिक थोड़ा  डर सा गया। लेकिन गोपाल के चेहरे पर ख़ुशी देख कर अनजान बन उसका स्वागत किया।
    " अरे भतीजे ! तू कैसे और कहाँ आ गया ? "
" राम-राम चाचा ! आज मैं खरीद दारी करने आया हूँ ! मेरे पास अब रुपयों  की  कमी नहीं है ! " गोपाल ने इस बार भी जादुई थैले के बारे में बता दिया। और सराय मालिक ने उसे भी चुरा लिया।
     अगले दिन गोपाल, थैले की चोरी से अनजान बाजार पहुँच गया। बहुत सारा सामान खरीदा। जब रुपये देने की बारीआई तो थैले में  रूपये नहीं निकले। क्यूंकि वह तो नकली था। दुकानदार ने उसे डाँट कर वहां से निकाल दिया। वह बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। क्रोध भी बहुत आया।
           वह क्रोधित हो जंगल में गया और भूतों वाले पेड़ के पास जा कर हाथ लहरा-लहरा क्रोध में चिल्लाते हुए बोला, " एक खाऊँ ! दो खाऊँ !! तीन खाऊँ !!! या चारों ही खा जाऊं ..........."
    भूत तो घबरा गए ! चारों झट से उसके सामने खड़े  हो गए।
"  अब क्या हुआ ? कल तुम खुशी -ख़ुशी गए थे !"
" तुम सब झूठे हो ! नकली वस्तुएं देकर मुझे बहला देते हो ! कल बाजार में मुझे बहुत अपमानित होना पड़ा था। "
" ना तो हम झूठे हैं और ना ही हमारी कोई भी वस्तू  नकली है ! तुम हमें सारी बात बताओ कि तुम कहाँ जाते हो और  क्या करते हो ? चारों भूत परेशान थे। गोपाल ने सारा घटनाक्रम बता दिया। भूत समझ गए कि यह सारी कारस्तानी सराय के मालिक की है।
    " तुम बहुत साफ दिल के हो गोपाल और भोले भी हो ! इसलिए तुम्हें सराय के मालिक ने ठग लिया है। "
" अब मैं क्या करूँ ?"
" उसे सबक तो सिखाना ही पड़ेगा। इस बार हम तुम्हें एक जादुई रस्सी और एक डंडा देते हैं ! "
      उन्होंने गोपाल को कुछ समझा कर वापिस शहर भेज दिया। उसे वहां देख कर सराय का मालिक चौंक गया। वह कुछ पूछता, इस से पहले ही गोपाल बोल पड़ा।
    " राम-राम चाचा।  आज मैं बहुत ही अद्भुत और चमत्कारी चीज़ लाया हूँ। जल्दी से कमरे में आओ ! "
सराय का मालिक चकित सा उसके पीछे चल पड़ा। गोपाल ने कमरा भीतर से बंद कर लिया। थैले से रस्सी और डंडा निकल लिए।
   " अरे यह क्या लाए हो तुम ? "
" देखो तो सही चाचा .... " फिर उसने रस्सी को आदेश दिया," जाओ इस आदमी को बांध दो ! "
  डंडे को पीटने का आदेश दिया। सराय का मालिक हतप्रभ था। बंधा हुआ था, हिल भी नहीं पा रहा था और ऊपर से चारों तरफ से डंडे की मार पद रही थी। दर्द से बिलबिला के मार का कारण पूछने लगा। उसने डंडे को रुकने का आदेश दिया।
      " यह डंडा मेरे आदेश की पालना करता है। अभी तो मैंने इसे रोक दिया है लेकिन अगर तुम मुझे यह नहीं बताओगे कि तुमने ही मेरी हांड़ी और थैले को चुराया है तो यह फिर से पीटेगा। "
      " नहीं-नहीं और नहीं ! तुम्हारे सामान मैंने ही चुराये थे ....माफ़ कर दो मुझे मुझे खोल दो तो मैं तुम्हें तुम्हारा सामान लौटा दूंगा ! " वह गिड़गिड़ा रहा था।
     गोपाल से उसे खोल दिया। अपना सामान ले कर घर की ओर चल दिया। चलने से पहले अपने और माँ के लिए कपड़े खरीदे और कुछ घर का सामान भी खरीदा।
        गाँव में माँ बे-हाल थी, क्यूंकि वह बिना बताये जो घर से गया था। वह दरवाजे पर ही निढ़ाल बैठी थी। दूर से गोपाल को आता देखा तो जैसे किसी मुरझाए वृक्ष में जान आ गई हो। दौड़ कर गले लगा लिया और रो पड़ी। कुछ देर बार संयत हो कर बहुत नाराज़ भी हुई कि उसे इस तरह नहीं जाना चाहिए था।
       वह भी शर्मिंदा था। उसने माँ को सारी  बात बताई और समझाई।
" माँ हम गाँव में दावत करेंगे ! "
" क्यों ! किसलिए ?"
" अब हम गरीब नहीं रहे। थैले में मनचाहे रूपये और हांडी से भरपूर भोजन पा सकते हैं। और अब मुझे कोई काम करने की भी जरूरत नहीं है। ऐश करेंगे ! "
" नहीं बेटा ! गरीब धन से नहीं , मन से होते हैं !  मेहनत की कमाई से जो सुकून मिलता है वही सच्चा ऐश है। जो तुम जादुई सामान लाये हो उनसे हम दावत नहीं करेंगे बल्कि उनको हम वापस देकर आएंगे। "
" क्यों माँ ! यह तो मुझे भूतों ने उपहार में दिए हैं। "
" ऐसे उपहार किस काम के जो हमें नाकारा बना दे। और सोचो अगर गाँव में किसी को पता चलेगा तो विश्वास कौन करेगा ? लोग तो यही कहेंगे ना कि जरूर ही ये कोई चोरी-डकैती करते होंगे ? "
" हां माँ ! ये तो मैंने सोचा ही नहीं था ! "
" हम लोग थैले से उतना ही रूपया लेंगे, जितने में हमारे घर की छत की मरम्मत हो जाये और खेत के लिए बीज खरीद सकें। "
     माँ की बात सही भी थी। गोपाल मान गया। उन्होंने थैले से जरूरत भर के  कुछ रूपये लिए और सारा सामान भूतों को लौटाने चल दिए। भूत भी माँ की बात और सोच से बहुत प्रसन्न थे। माँ ने उन भूतों को यह वचन भी दिया कि जो रूपये उन्होंने थैले से लिए हैं वे एक तरह से क़र्ज़ है और यह क़र्ज़ वह किसी जरूरतमंद की सहायता करके चुका दिया करेगी ताकि किसी और माँ  बच्चे से बिछुड़ना ना पड़े। गोपाल और उसकी माँ ख़ुशी-ख़ुशी घर की और चल दिए।


उपासना सियाग



        

4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत रोचक और शिक्षाप्रद कहानी...

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  2. जय मां हाटेशवरी...
    अनेक रचनाएं पढ़ी...
    पर आप की रचना पसंद आयी...
    हम चाहते हैं इसे अधिक से अधिक लोग पढ़ें...
    इस लिये आप की रचना...
    दिनांक 26/07/2016 को
    पांच लिंकों का आनंद
    पर लिंक की गयी है...
    इस प्रस्तुति में आप भी सादर आमंत्रित है।

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  3. बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको .
    https://www.facebook.com/MadanMohanSaxena

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  4. बहुत डर लगता था बचपन में भूत से। .
    बहुत सुदंर

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