शनिवार, 23 फ़रवरी 2013

आजकल का माहौल और देश के प्रति उदासीन होते बच्चे......

 राधिका  उस समय सन्न रह गयी ,जब उसके बेटे के हॉस्टल से फोन आया कि  उसके बेटे के पास से मोबाइल पकड़ा गया है तो उसने लाख सफाई दी कि उन्होंने बेटे को कोई मोबाइल नहीं दिया बल्कि पैसे भी बहुत लिमिट से देते हैं।स्कूल वालों पर कोई असर नहीं हुआ। कुछ दिन बाद दस हज़ार रुपयों का जुर्माना रूपी पात्र घर पहुँच गया।
बाद में बेटे से बात होने पर उसने बताया वह  फोन उसके दोस्त का था और वह  दोस्त का नाम कैसे लेता ...! फिर राधिका  के यह पूछने पर कि जो दस हज़ार का जुर्माने का पत्र आया है वो कौन देगा ...? तो बेटे ने लापरवाही से जवाब दिया कि "पापा अपने आप जुर्माना  माफ़ करवा देंगे, एक बार पहले भी तो जुर्माने का पत्र आया था तब भी उन्होंने यही कहा था ना, मैंने कोई जुर्माना नहीं भरना ...!"यह सुन कर तो राधिका  का मन और भी बैठ गया। सोच में पड़  गयी कि वे बच्चों में क्या संस्कार भर रहे है गलती कर रहे हैं और कोई शर्मिन्दगी भी नहीं।
अब यह तो एक छोटी सी घटना है पर यहाँ क्या सिर्फ बच्चे का ही दोष है ..!जब उसके पिता ही उसको डांटने के बजाय उसके जुर्माने को ना भरने कि बात करते हो तो वह  क्या सीखेगा, फिर गलत राह ही पकड़ेगा बच्चा ...!
हम मानते है ;बच्चे देश का भविष्य होते हैं तो  फिर हम कैसे भविष्य की रचना कर रहें है ?बच्चे किस तरह से उदासीन होते जा रहे हैं अपने फ़र्ज़ के प्रति। जैसे उन्हें कोई परवाह ही नहीं है किसी भी बात की। लेकिन यह दोष तो अकेले बच्चों का तो नहीं है। इसके दोषी तो स्वयं अभिभावक , स्कूल और आस -पास का परिवेश ही है।
अभिभावक यह कह कर पल्ला झाड़ने की कोशिश करते हैं कि  आज-कल का सिस्टम ही ऐसा हो गया है। बच्चे किसी की सुनते ही नहीं।ये सिस्टम बनाया किसने है ? कितने ही अभिभावक ऐसे होते हैं जो बच्चों के सामने ही कानून तोड़ते  है और तोड़ने की बात करते हैं फिर बच्चों से क्या उम्मीद करेंगे ...!
बच्चों के सामने ही बिना सोचे कि बच्चे के मन पर क्या असर होगा , हम कई बार अपने देश और देश की सरकार को कोसने लगते हैं। यह  कहाँ तक उचित है ? ऐसे में क्या बच्चे के मन में अपने देश और लोकतंत्र के प्रति उदासीनता नहीं होगी। बच्चे तो कच्ची मिट्टी की तरह होते है जैसा वातावरण मिलता है वैसे ही तो हो जाते हैं।
आज-कल हर तरफ एक ही चर्चा है आज -कल के बच्चे बिगड़ रहे है , अश्लीलता  की तरफ जा रहे हैं। मेरे विचार में यह कहने से पहले हम अपने ही गिरेबान में झांके तो अच्छा रहेगा। कोई भी पारिवारिक समारोह क्यूँ ना हो गीत-संगीत का कार्यक्रम तो होता ही है और किस तरह के अश्लील  और अमर्यादित गानों पर भोंडा नाच होता है।  कई जगह पीने -पिलाने का दौर भी चलता है तो फिर बच्चों के बिगड़ने का दोष किसलिए ...!
अक्सर  ऐसा भी होता है अभिभावक बच्चों के सामने अपने देश को कमतर आंक कर विदेश या  विदेशी वस्तुओ को महत्व देते हैं। ऐसा करके अभिभावक बच्चो को अपने देश-प्रेम से दूर ही कर रहे होतें है। जबकि बच्चों को यह समझाना चाहिए कि  कोई भी  विकसित देश क्यूँ आगे है ,क्यूँ वह इतनी तरक्की कर रहा है। क्यूँ कि वहां के हर नागरिक को गर्व होता है "वो एक महान देश का नागरिक है।  उनका हर नागरिक दुनिया का सर्वश्रेष्ठ नागरिक है...!"
लेकिन  हम  बच्चों को समझाने की बजाय  , 'हमारा इतिहास क्या था या हमारे पूर्वज क्या थे ,आज कल के बच्चे  तो कुछ आगे बढ़ने कि बात ही नहीं सोचते ....."
ऐसी नकारात्मक बातें बच्चों के सामने की ही क्यूँ जाये जिससे बच्चे हतोत्साह हों .ऐसे में बच्चे के मन पर क्या असर होता है कौन समझना चाहता है ....

घर के बाद  स्कूल का वातावरण बच्चे को बहुत प्रभावित करता है और उसके जीवन को एक नयी दिशा भी देता है। लेकिन यहाँ भी  शिक्षा सिर्फ  व्यवसाय बन चुकी है  बच्चे के मन -मस्तिष्क पर क्या असर होता है इसका उनको  कोई सरोकार  नहीं होता। यहाँ भी बस गला काट प्रतियोगिता पर ही जोर होता है। कई बार तो शिक्षक अपने निजी तनावों का बोझ भी बच्चों पर उतार  देते है।  जो बच्चे पढ़ाई में अच्छे होते है उनको ही आगे आने को कहा जाता है कमजोर बच्चों को कई बार बहुत बार जलील किया जाता है जिससे वह हीन -भाव से ग्रसित को कर अपना नुक्सान कर बैठते है।
अगर  स्कूलों में कुछ विषयों को कम करके  व्यवहारिक ज्ञान और जीवन के असली मूल्यों  और बच्चों के कर्तव्यों के बारे में बताया जाये।स्कूली पाठ्यक्रम में एक विषय है "नैतिक -शिक्षा" , इसकी जगह अगर व्यवहारिक शिक्षा का ज्ञान दिया जाय  तो बच्चे बेहतर नागरिक बन सकते है।क्यूंकि हम हमारे हक़ के प्रति तो जागरूक हैं पर हमारे फ़र्ज़ क्या है यह भूलने लगे हैं यह भी स्कूलों में सिखाया जाना बहुत आवश्यक है।  साथ ही में उनको ट्रेफिक रूल्स के बारे में समझाया जाये क्यूँ कि अक्सर हम देखतें है कि लोग कार -स्कूटर आदि तो चला लेतें हैं पर कैसे चलाना चाहिए उनको नहीं पता होता है।

इस बात में भी संदेह नहीं है कि कई बार बच्चों के संस्कार अच्छे होतें है , क्यूंकि कोई भी माँ-बाप बच्चों को गलत संस्कार देने की कोशिश नहीं करता , वे बच्चों को सभी सुविधा दे देतें है पर अपना समय नहीं दे पाते और बच्चे गलत संगति मैं पड़जाते हैं  .वे बच्चो की तरफ ध्यान ही नहीं दे पाते बच्चे कहाँ जाते है  ,कौन उनके दोस्त हैं क्या उनकी संगति है . बुरी संगति भी बच्चों को बिगड़ने का कारण बनता है। आज कल हर बच्चे के पास मोबाइल और बाईक तो उनके स्टेट्स सिम्बल ही बन गया है .पर ये स्टेट्स -सिम्बल , बच्चो की  नासमझी और अभिभावकों कि लापरवाही से कई बार बहुत महंगा पड़ता है ....!. 
आज की आधुनिक सुविधाओं की चकाचौंध भी बच्चों को भटकाने की जिम्मेवार है और कम समय में ज्यादा पाने की होड़ भी...बढ़ते नशों की लत इसी का परिणाम है।

तो क्यूँ ना हम हमारे देश के भविष्य  को अपने हाथो से सवारें। और उनको समझाए  हमारा देश ,जिसे सोने की चिड़िया कहा जाता था वो अब भी कहलाया जा सकता है।और समझाए कि हमारा देश ही दुनिया का सर्वश्रेष्ठ देश है और हम सब मिल कर इसे आगे ले जा सकते है।


सोमवार, 14 जनवरी 2013

जब मैं बहुत सुखी थी........

बात उन दिनों की है जब मैं बहुत सुखी थी। सुखी तो अब भी हूँ पर तब ज्यादा सुख का अनुभव करती थी जब मेरे बच्चे छोटे थे और मैं उनकी प्यारी और भोली बातों  में जीवन की खुशियाँ महसूस करती थी।
दो बेटे और दोनों ही विपरीत स्वभाव  के ....! बड़ा अंशुमन जहाँ मितभाषी ,भावुक और शांत स्वभाव का है तो छोटा प्रद्युमन बातूनी , व्यवहारिक और बेहद शरारती .....
मुझे दोनों के साथ उनके स्वभाव  के मुताबिक ही व्यवहार  करना होता है। बड़ा बेटा जहाँ बात -बात पर बात को दिल से लगा लेता है और चुप हो जाता है , वहीँ छोटा बात को इग्नोर कर झट से  जवाब  दे देता है।
अंशुमन स्कूल से आता तो हर बात बताता और सबसे पहले अपने टेस्ट के नम्बर बताता। एक दिन आधा नम्बर कम आया तो मेरे मुहं से निकल गया , " अरे , ऐसे कैसे तुम पास होओगे ...! "
अगले दिन स्कूल गया तो बोला , " मम्मा आप चिंता  मत करना , आज मैं पूरे  नम्बर ला कर दिखाऊंगा  , फिर मत कहना की कैसे पास  होऊंगा।"
प्रद्युमन स्कूल से आता तो मेरी कुछ पूछने की हिम्मत ही ना होती ....पहले उसके हाथ-मुहं धुलवाने सीधे बाथरूम में ले कर जाती। वहां थोडा बहुत बात होती और मैं पूछना चाहती की आज टेस्ट में क्या हाल चाल  रहे। फिर तो भोले से प्यारे से मुख से जो बातें फूटती ...कि  बस मेरे पास उसे गले लगाने के अलावा कोई चारा ही नहीं रहता।
लेकिन एक दिन बहुत हैरानी हुयी कि प्रद्युमन बहुत शांत मूड से अपने ऑटो से उतरा और चाल भी अकड़ी हुयी थी ( टेस्ट में नंबर अच्छे आये थे उसके हिसाब से )...बोला, " आज मेरे जीरो नम्बर भी नहीं आये , एक नम्बर भी नहीं आया , तो बताओ कितने नम्बर आये होंगे भला।"
मैंने सोचा चाल में इतनी अकड है तो दस में से पांच तो आये ही होंगे। मैं कुछ बोलती उससे पहले ही बहुत खुश हो कर बोला , " मेरे आज डेढ़ नम्बर आये है ...अब तो आपको चिंता नहीं है , मैं पास हो जाऊंगा ना ...!"
मेरे पास उसके भोले सवाल के जवाब में सिर्फ जोर से हंसी ही थी।
परीक्षाओं से पहले बोलता , मम्मा , हमारी प्रिंसिपल सिस्टर ने कहा है  पास होने के लिए 33 नम्बर जरुरी है तो मैं आपको ला कर दिखा दूंगा।"

" आप टेंशन मत लिया करो ...!" और गले लग जाता।
रात तो जब टीवी देखते तो रिमोट मेरे हाथ में रहता दोनों बेटे मेरी अगल - बगल में बैठते। कोई भी अवांछनीय दृश्य या हिंसक दृश्य होता तो मैं जल्दी से चैनल बदल देती।ऐसे ही एक दिन एक फिल्म चल रही थी टीवी पर। हम तीनो ही बैठे थे और एक बेहद खून-खराबे वाला दृश्य आगया , मैंने झट से चैनल बदल दिया। प्रद्युमन  , जो  बहुत दिलचस्पी से देख रहा था , विचलित सा हुआ तो मैंने  भी बात बदलनी चाही और दोनों को अपनी बाँहों के घेरों में समेटते हुए कहा , " तुम दोनों मेरे बेटे नहीं मेरी आँखें हो ...!"
अंशुमन ने तो भावुक हो कर ख़ुशी से मेरे कन्धों पर सर रख दिया। लेकिन प्रधुमन उछल कर सामने बैठ गया।
मेरी एक आँख में ऊँगली रख कर लगभग दबाते हुए बोल पड़ा , " मम्मा , ये आँख फूटेगी तो कौन मरेगा।"
मैं एक दम से हैरान हो गयी और बहुत जोर से हंस पड़ी।

ना जाने कितनी बातें छोटी-छोटी , प्यारी -प्यारी जो याद करके कभी हंस लिया जाता है तो उदास हो लिया जाता है।लेकिन जो समय बीत गया वह वापस तो नहीं आता बस यादों की संदुकची खोल कर देख लिया जाता और कुछ समय महका लिया जाता है। 

रविवार, 9 दिसंबर 2012

बच्चे शब्दों पर बहुत गौर करते है ....

बच्चे छोटे और भोले से लगते जरुर हैं पर समझते सब कुछ है। बोलने के लिए उनके पास पर्याप्त शब्द चाहे ना हो लेकिन जो भी हम बोलते हैं या हमारा आचरण बहुत जल्द पकड़  लेते है।

एक बच्चा स्कूल से आया तो  उसकी माँ ने देखा के वह अपनी कॉपी में काम सही तरीके से नहीं उतार  कर लाया। माँ के डांटने पर बच्चा मुहं फुला कर बोला , " आप पैदा ही क्यूँ हुए ...?"
अब बात इतने मासूम तरीके से गाल फुला कर बोली गयी थी कि माँ को बरबस हंसी आ गयी।लेकिन सोच में पड़ गयी कि उसके माता-पिता ने भी यह बात उसे नहीं कहा  और वह या उसके पति ने भी कभी ऐसा नहीं कहा अपने बच्चों को , तो यह बात इसने कहाँ से सीखी।
उसने बच्चे से पूछा क्या उसकी टीचर ऐसे बोलती है। बच्चे ने बताया कि एक लड़की ऐसा बोलती है जो उसके साथ पढ़ती है। माँ ने उसे तो प्यार से समझा दिया के ऐसा नहीं बोलते।लेकिन क्या बच्ची की माँ के लिए ऐसा बोलना सही था ?और क्या एक टीचर को इस बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए था ?

अब दो छोटे  बच्चे है एक भाई और एक उसकी बहन। भाई बहुत शरारती है और बहन बातूनी है। भाई जो बहुत शरारती है कभी दीवार पर चढ़ता तो कभी वहां से छलांग लगा देता। उसे ऐसा करते देख उसकी माँ की सहेली बोल पड़ी , " अरे वाह ...! तू तो बड़ा हो कर पुलिस में या सेना में जायेगा ...! बहुत जोश और फुर्ती है तुझ में ...,"
तभी बहन बोल पड़ी , " नहीं आंटी , मेरे पापा तो कहते है यह बड़ा हो कर चोर बनेगा ..!"
सुन कर बच्चों की माँ बहुत शर्मिंदा हुयी और उसकी सहेली  मन ही मन बहुत हैरान हुई लेकिन हंस कर बात टाल गई।

अब एक और बच्चे की बात ...वह शाम को खाने के वक्त अचानक पूछ बैठा , " क्या हमारा देश चोरो का देश है ...!"
अब सवाल ऐसा था तो माता-पिता दोनों चौंक उठे और एक साथ ही पूछा कि वह ऐसा क्यूँ कह रहा है।तो बच्चे ने बताया के उसके ट्यूशन वाले सर ऐसा कह रहे थे कि भारत तो चोरों का ही देश है ,विदेश में सब अच्छा होता है। बच्चे के अभिभावक बहुत हैरान हुए और अगले दिन टीचर को उनकी गलती बताते हुए हटा दिया।जब एक शिक्षक ही बच्चे से ऐसी बात करेगा तो वह क्या  से सीखेगा ?

ऐसी बहुत सारी  बातें और उदहारण हमें अपने आस- पास मिल जायेंगे। यह बताने वाली या समझाने वाली बात नहीं है के बच्चे कहाँ से और क्या सीखते है।
 माता-पिता , शिक्षक हर कोई इस बात से परेशान  है के आज -कल के बच्चे बहुत बिगड़ गए है , किसी को समझते नहीं है। बड़ों की इज्ज़त ही नहीं रह गयी।देश के लिए प्रति प्यार ही नहीं रह गया अदि-आदि ....
सारा दिन देश के नेताओं को कौन कोसता है। माना कि अधिकतर नेता बहुत भ्रष्ट है और देश -हित के लिए नहीं बल्कि वे अपना ही हित साधते हैं।पर ये बात बच्चे नहीं समझते। वे जब छोटे होते है तो सिर्फ अपने बड़ों का नजरिया ही समझते है और वही बात उनके मन में घर कर जाती है और सारी  उम्र किंकर्तव्यमूड में ही जीते हैं।

बच्चों को सारा दिन देश को कमतर और विदेश या विदेशी वस्तुओं को बेहतर कौन बताता है।शिक्षकों की बुराई कौन करता है।यह तो उनके अभिभावक या शिक्षक ही करते हैं।
आज-कल जैसी पीढ़ी का निर्माण हो रहा है उसे देख कर तो मन सहमा सा ही जाता है।पर इसका जिम्मेदार कौन है ......


शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

चिड़िया जैसी गुड़िया ...

एक चिड़िया
एक गुड़िया ....
चिड़िया जैसी गुड़िया  ...

और चिड़िया ...!
चिड़िया जैसी कोई नहीं
पर फैलाती उड़ जाती
दाना चुगती
चहचहाती
कभी - कभी ठुमक कर
चलती
बिन घुंघरू छनकती ......




और गुड़िया ...!
पर नहीं फैलाती
मन की उड़ान ही भरती ..

पैरों में पायल
ठुमक कर भी ना चलती ..

चिड़िया से मिली गुड़िया
गुड़िया मुस्काई
चिड़िया चहचहाई ...


चिड़िया पर फड़फड़ाती
उड़ जाती ..
गुड़िया भी "पर" फड़फड़ाती
उड़ ना पाती
चल भी ना पाती
कमजोर पैर
बस नजर भर देखती
उडती चिड़िया ....