गुरुवार, 10 मार्च 2016

जो पढ़ो वह गुनो भी..

     सर्दियों की छुट्टियां होने से पहले सभी शिक्षकों की मीटिंग बुलाई गई। मीटिंग में प्रधानाध्यापक जी बोले कि इस  बार छुट्टियों में बच्चों को पाठ्य पुस्तकों का गृह कार्य ना दे कर कोई रचनात्मक कार्य दिया जाये। एक जनवरी से सात जनवरी तक सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जाता है। ऐसे में बच्चों को इस बारे में कुछ सामग्री एकत्रित करके लाने को कहा जाये। जैसे, कविता, कहानी, चार्ट  या सुरक्षा के नियमों की जानकारी आदि कुछ भी, जिस से बच्चों को सही जानकारी मिले और भविष्य में सावधानी भी रख सकें। सभी को यह प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा।
        स्कूल की छुट्टी होने से पहले आखिरी के दो पीरियड में क्रिसमस मनाने के लिए बच्चे सभागार में एकत्रित हुए तो उनको  जानकारी दी और सभी बच्चों के लिए यह अनिवार्य है। बच्चे खुश थे कि उबाऊ होमवर्क से तो छुटकारा मिला। अब स्कूल दो जनवरी को लगना था।
        टुनिया घर पहुँचते ही दादा जी के पास पहुंची।
     " अरे, आगई मेरी सोन चिरैया !"
    " हाँ जी दादा जी। "
" छुट्टियाँ हो गई होगी अब तो !"
    " हो गई, दादा जी ! एक ख़ुशी की बात है कि इस बार होमवर्क नहीं मिला !"
" बहुत अच्छी बात है बिटिया, दूसरी कक्षा में पढ़ती हो और इतना सारा पढाई का बोझा !" दादी ने कहते हुए अपने दोनों हाथ फैला दिए। टुनिया भाग के दादी की गोद में चढ़ गई।
" अच्छा ! होमवर्क नहीं दिया तो क्या कहा है ? छुट्टियों में कोई विशेष करने को कहा है क्या ?"
" मालूम नहीं दादा जी, ये देखिये डायरी, इसमें ही कुछ लिखा है। "
" ओह्हो ! यह तो बहुत अच्छा काम दिया है ! सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने के लिए कोई सामग्री तैयार कर के लानी है। सड़क पर चलते तो सभी है लेकिन चलने के नियम किसी को पता है या नहीं कौन जानता है। ऐसी बातें बच्चों को स्कूल के समय से ही मालूम होना चाहिए बल्कि मैं तो कहता हूँ कि हर स्कूल में एक सप्ताह में ऐसा ही पीरियड होना चाहिए जिस से बच्चों को सड़को पर चलने के नियम पता हो, देश के प्रति उनके नैतिक दायित्व क्या है!"
" आप को तो भाषण देने की आदत है, मौका मिलना चाहिए !"
" यह भाषण नहीं है ! यह जिम्मेदारी है हम सबकी और हर कोई ही यह भूले हुए है !"
  " अच्छा चलो टुनिया तुम खेलो। मैं तुम्हें एक कविता सिखाऊंगा। "
         छुट्टियाँ बहुत मज़े से बीत गई। छुट्टी के बाद स्कूल का पहला दिन और नए साल का भी पहला दिन। बच्चों से अगले दिन अपने -अपने कार्य के साथ आने  गया।
        हॉल में चार्ट सजा दिए गए थे। एक तरह से प्रदर्शनी सी लगी थी। स्टेज़ पर प्रधानाध्यापक जी और सभी शिक्षक बैठे थे। बच्चे एक -एक कर के अपने विचार  कहानियां, लेख और कवितायेँ सुना रहे थे। टुनिया की बारी आने वाली थी। उसका दिल धक् -धक् कर रहा था। कुछ ही देर में निहारिका नाम पुकारा गया। यह टुनिया का स्कूल में  नाम था।वह  स्टेज पर खड़े हो कर एक बार तो सहम सी गई। फिर दादा जी की बात याद आई कि जब माईक के आगे खड़ी होगी तो एक बार तो घबराहट जरूर होगी, क्यूंकि यह पहली बार है।  तब उसे यह सोचना चाहिए की वह अपने घर में ही है और अपने परिवार लोगों को सुना रही है।  यही किया उसने। सबको अभिवादन कर के अपनी कविता सुनाने लगी।
               " जब भी तुमको पैदल चलना
                 बीच सड़क पर कभी ना चलना।
 
                 सड़क किनारे बनी जो पगडण्डी
                 उसी पर रखना अपनी हदबंदी।

                पार सड़क पर जब भी जाना
                 दायें -बाएं नज़र दौड़ा कर
                 जेब्रा क्रॉसिंग पर ही चलना। "

          टुनिया की छोटी सी लेकिन सीख भरी कविता पर देर तक तालियां बजती रही। फिर अध्यापकों ने भी विचार रखे बच्चों को समझाया की किस तरह से सुरक्षित रहें। अंत में प्रधानाध्यापक जी ने सभी के प्रयासों की सराहना की। यह कोई प्रतियोगिता तो थी नहीं कि किसी एक को सर्वश्रेष्ठ ठहराया जाता।  ज्ञानवर्धक और शिक्षाप्रद कार्यक्रम था जो कि बच्चों को जागरूक करने के लिए आयोजित किया गया था। सफल भी रहा या नहीं यह नहीं कहा जा सकता। क्यूंकि जब तक किसी ज्ञान को अपने जीवन में क्रियान्वित ना किया जाये वह अधूरा ही रहेगा।
          शाम को टुनिया दादा जी के साथ पास के पार्क में जाने को तैयार हुई। चलते -चलते दादा जी की ऊँगली छुड़ा कर सड़क पर भागते हुए अपने दोनों हाथ जैसे हवा में उड़ाते हुए अपनी कविता गाने लगी कि सामने से एक कार  उसे बचाते हुए करीब से गुजर गई। दादा जी ने खींच कर गले लगा लिया। एक बार तो कलेजा मुहँ को हो आया था। दादा जी ने समझ लिया की टुनिया ने कविता सिर्फ याद की है अभी समझी नहीं है। उन्होंने निश्चय किया कि  आज वह टुनिया को समझायेंगे भी कि जो पढ़ो वह गुनो भी। उसका हाथ अच्छे से पकड़ कर पार्क की ओर चल पड़े।

उपासना सियाग ( अबोहर )
                

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