रविवार, 17 जुलाई 2016

भूतों का उपहार ( बाल कहानी )

      बहुत पुरानी बात है। सदियों पुरानी तो होगी ही। एक गांव में गोपाल और उसकी माँ रहते थे। उसके पिता का स्वर्गवास हो चुका था। आजीविका के लिए एक छोटा सा जमीन का टुकड़ा था। उसमें वह और उसकी माँ मौसम के अनुसार सब्जियां उगाते और बेच कर कुछ कमाई कर लेते। लेकिन वह कमाई पर्याप्त नहीं थी।
    गोपाल की माँ चाहती थी कि वह कुछ और काम करे। शहर जाये। अक्सर उसे कहती कि अगर  उसका बापू होता तो उसे कोई चिंता नहीं थी। लेकिन अब वह पंद्रह वर्ष का हो गया है तो उसे भी कुछ मेहनत करके अपनी आमदनी मे बढ़ोतरी  करनी ही चाहिए। एक दिन गोपाल मान ही गया।
    दो-तीन दिन बाद माँ ने गोपाल को चार रोटी, चटनी के साथ बाँध कर दे दी।  गोपाल को शहर जाने के लिये जंगल पार करना पड़ेगा, यह सोच कर माँ ने उसे नसीहतें भी बहुत सारी दी और घर से विदा कर दिया।
     जंगल से गुजरते हुए  दोपहर हो आई। भूख भी लग गई थी।
     वह कोई पानी का  स्रोत देखने  लगा कि कहीं पानी मिल जाये तो वहीँ पेड़ की छावं तले बैठ कर रोटी खा लेगा। तभी कुछ दूरी पर उसे एक कुआं नज़र आया। पास गया तो वहां एक बाल्टी भी लटकी थी। कुएं से पानी निकाल कर हाथ- मुँह धो कर पास ही साफ जगह पर साथ लायी चादर बिछा कर बैठ गया। रोटी की पोटली खोलते हुए सोच रहा था कि पता नहीं आगे कितना रास्ता है कब तक शहर पहुंचेगा। रोटियां तो चार ही थी सारी खाए कि आधी छोड़ दे।
   सोचते -सोचते, खुद से बातें करते जोर - जोर से बोलने लगा, " एक खाऊँ, दो खाऊँ या सारी खा जाऊँ ! "
संयोग वश वहीँ एक पेड़ पर चार भूत रहते थे। गोपाल की बात उनके कानों में पड़ी तो वे चौंक पड़े। वे सभी भयभीत हो गए कि उनको खाने वाला कौन है ये ? सभी गोपाल के आगे खड़े होगये और विनती करने लगे, " अरे भाई ! हमने क्या बिगाड़ा है तुम्हारा ?  हमें खाने को किसलिए कह रहे हो ? "
        गोपाल भी भयभीत हो गया। सकते में आ गया ! भय से आँखे भींच ली।  लेकिन वह चतुर बालक था, मन ही मन कुछ सोचता हुआ आँखे बंद किये रहा। उसे आँखे बंद किये हुए देख भूत और भी भयभीत हो गए कि  ना जाने क्या मंत्र पढ़ रहा है।
         " देखो भाई ! हम लोग यहाँ शांति से रहते है कोई उत्पात नहीं करते किसी राहगीर को सताते भी नहीं हैं, हम पर रहम करो। "
      " अच्छा ! फिर ठीक है ! " गोपाल आँखे खोलते हुए आवाज़ को गंभीर बनाते हुए बोला।
" तुम  मेरी शहर जाने में सहायता करो। ऐसा कोई रास्ता बताओ जो मुझे जल्दी और अँधेरा होने से पहले पहुंचा सके। " भूतों ने उसे शहर का मार्ग बता दिया। लेकिन उससे पहले उसे एक हांडी  उपहार में दी कि इस में से जितना चाहो और अपनी पसंद का भोजन पा सकोगे। गोपाल को मनपसंद भोजन भी करवाया।
        शहर पहुँचते -पहुँचते शाम हो गई। रात को रुकने के लिए किसी से पूछा तो उसे एक सराय का पता बता दिया। सराय में एक कमरा ले लिया। खाने का पूछा तो उसने मना कर दिया कि उसके पास है। कमरे में जा कर उसे विचार आया कि क्यों ना सराय के मालिक को भी भोजन के लिए बुला लूँ। सराय का मालिक अचम्भित हुआ कि यह फटेहाल सा बालक मुझे क्या भोजन करवाएगा फिर भी उसके कहने पर उसके कमरे में चला गया। गोपाल ने जल्दी से कमरा अंदर से बंद कर लिया तो सराय मालिक भयभीत हो गया।
  " अरे भाई ! दरवाज़ा अंदर से क्यों बंद किया है ! मुझे मारना चाहते हो क्या ? "
" डरो नहीं चाचा ! मेरे पास एक करामाती चीज़ है जिससे मनचाहा खाना मिलेगा। "
" अोह सच में ! "
" हाँ , ऐसे चकित ना होअो ! "
गोपाल ने हांडी निकाली और अच्छे-अच्छे पकवान मँगवा लिया।
" वाह बेटा, ये तो बहुत बढ़िया चीज़ है ! तुम कहाँ से आये हो और कहाँ जाओगे। अपने बारे तो बताया ही नहीं तुमने तो ! "
" चाचा मैं यहाँ, गाँव से कमाई करने आया हूँ। आप मुझे कहीं नौकरी लगवा दोगे ? "
" हाँ -हाँ क्यों नहीं ...., पर तुम जरा सोचो ! इंसान कमाई किसलिए करता है, दो वक्त की रोटी के लिए ? तो तुम्हें क्या जरूरत है कमाई की ? तुम्हारे पास तो ये जादुई हांडी  है, घर जाओ और ऐश करो ! "
  गोपाल को भी बात ठीक लगी। उसने भी अगले दिन अपने गांव वापस जाने का सोचा।
    उधर सराय  मालिक के  मन में लालच आ गया। उसने सोचा कि क्यों ना वह जादुई हांडी चुरा ले। उसने ऐसा ही किया। आधी रात को उसने एक साधारण हांडी से गोपाल की जादुई हांडी बदल दी। सुबह उठने पर गोपाल को हांडी कुछ बदली सी तो लगी पर मन का वहम  जान के ज्यादा विचार नहीं किया।
            गाँव जा कर माँ को सारी  बात बताई और बोला ," माँ , मैं ये जादुई हांडी लाया हूँ..... तुम सारे गाँव को इक्क्ठा करो , हम दावत करेंगे। "
 " लेकिन पहले हम इसे परखेंगे। क्या सच में इसमें से भोजन निकलता भी है ? कहीं गांव वालों के सामने हमारा उपहास ना बन जाये। "
     माँ की बात भी सही थी। दोनों ने हांडी सामने रखी और बैठ गए। अब नकली हांडी से भोजन क्या निकलना था ! माँ बहुत नाराज़ हुई। गोपाल भी हैरान हुआ।  उसने अगले दिन फिर से जंगल में जाने का सोचा। माँ ने समझाया कि ना तो भूतों के चक्कर में पड़ने की  और ना ही शहर जाने की जरूत नहीं है। लेकिन गोपाल आहत था। उसने तो जाने की ठान  ली थी। अगले दिन वह बिना बताये ही चल पड़ा।
            जंगल में वहीँ पहुँच कर जोर -जोर से बोलने लगा...... एक खाऊँ , दो खाऊँ ,तीन खाऊँ या चारों ही खा जाऊँ.....! "
       पेड़ पर स्थित भूतों को जब यह सुनाई  दिया तो वे घबरा कर उसके सामने आकर खड़े हो गए। एक बोला,"  अरे भाई ! अब क्या हुआ ? "
" मुझे नकली हांड़ी देते हो और पूछते भी हो कि क्या हुआ ? " गोपाल नाराज़गी से बोला।
" अच्छा ! यह  कैसे हो सकता है ?  एक भूत बोला।
          गोपाल ने सारी बात बताई। भूतों उसे एक थैला दिया और बोले कि इसमें से जितने चाहो रूपये निकाल सकते हो। थैले में से रूपये निकाल कर भी दिखाए। गोपाल अब और भी खुश हुआ। वह जल्दी से गाँव जाना चाहता था। फिर यह सोच के  रुक गया कि आधे राह तो आ ही गया तो क्यों ना माँ और अपने लिए कुछ कपड़े और कुछ घर का सामान ले जाऊँ।
          पहुँचते-पहुँचते संध्या गई थी। इसलिए पहले वह सीधे सराय पहुंचा। सराय का मालिक थोड़ा  डर सा गया। लेकिन गोपाल के चेहरे पर ख़ुशी देख कर अनजान बन उसका स्वागत किया।
    " अरे भतीजे ! तू कैसे और कहाँ आ गया ? "
" राम-राम चाचा ! आज मैं खरीद दारी करने आया हूँ ! मेरे पास अब रुपयों  की  कमी नहीं है ! " गोपाल ने इस बार भी जादुई थैले के बारे में बता दिया। और सराय मालिक ने उसे भी चुरा लिया।
     अगले दिन गोपाल, थैले की चोरी से अनजान बाजार पहुँच गया। बहुत सारा सामान खरीदा। जब रुपये देने की बारीआई तो थैले में  रूपये नहीं निकले। क्यूंकि वह तो नकली था। दुकानदार ने उसे डाँट कर वहां से निकाल दिया। वह बहुत अपमानित महसूस कर रहा था। क्रोध भी बहुत आया।
           वह क्रोधित हो जंगल में गया और भूतों वाले पेड़ के पास जा कर हाथ लहरा-लहरा क्रोध में चिल्लाते हुए बोला, " एक खाऊँ ! दो खाऊँ !! तीन खाऊँ !!! या चारों ही खा जाऊं ..........."
    भूत तो घबरा गए ! चारों झट से उसके सामने खड़े  हो गए।
"  अब क्या हुआ ? कल तुम खुशी -ख़ुशी गए थे !"
" तुम सब झूठे हो ! नकली वस्तुएं देकर मुझे बहला देते हो ! कल बाजार में मुझे बहुत अपमानित होना पड़ा था। "
" ना तो हम झूठे हैं और ना ही हमारी कोई भी वस्तू  नकली है ! तुम हमें सारी बात बताओ कि तुम कहाँ जाते हो और  क्या करते हो ? चारों भूत परेशान थे। गोपाल ने सारा घटनाक्रम बता दिया। भूत समझ गए कि यह सारी कारस्तानी सराय के मालिक की है।
    " तुम बहुत साफ दिल के हो गोपाल और भोले भी हो ! इसलिए तुम्हें सराय के मालिक ने ठग लिया है। "
" अब मैं क्या करूँ ?"
" उसे सबक तो सिखाना ही पड़ेगा। इस बार हम तुम्हें एक जादुई रस्सी और एक डंडा देते हैं ! "
      उन्होंने गोपाल को कुछ समझा कर वापिस शहर भेज दिया। उसे वहां देख कर सराय का मालिक चौंक गया। वह कुछ पूछता, इस से पहले ही गोपाल बोल पड़ा।
    " राम-राम चाचा।  आज मैं बहुत ही अद्भुत और चमत्कारी चीज़ लाया हूँ। जल्दी से कमरे में आओ ! "
सराय का मालिक चकित सा उसके पीछे चल पड़ा। गोपाल ने कमरा भीतर से बंद कर लिया। थैले से रस्सी और डंडा निकल लिए।
   " अरे यह क्या लाए हो तुम ? "
" देखो तो सही चाचा .... " फिर उसने रस्सी को आदेश दिया," जाओ इस आदमी को बांध दो ! "
  डंडे को पीटने का आदेश दिया। सराय का मालिक हतप्रभ था। बंधा हुआ था, हिल भी नहीं पा रहा था और ऊपर से चारों तरफ से डंडे की मार पद रही थी। दर्द से बिलबिला के मार का कारण पूछने लगा। उसने डंडे को रुकने का आदेश दिया।
      " यह डंडा मेरे आदेश की पालना करता है। अभी तो मैंने इसे रोक दिया है लेकिन अगर तुम मुझे यह नहीं बताओगे कि तुमने ही मेरी हांड़ी और थैले को चुराया है तो यह फिर से पीटेगा। "
      " नहीं-नहीं और नहीं ! तुम्हारे सामान मैंने ही चुराये थे ....माफ़ कर दो मुझे मुझे खोल दो तो मैं तुम्हें तुम्हारा सामान लौटा दूंगा ! " वह गिड़गिड़ा रहा था।
     गोपाल से उसे खोल दिया। अपना सामान ले कर घर की ओर चल दिया। चलने से पहले अपने और माँ के लिए कपड़े खरीदे और कुछ घर का सामान भी खरीदा।
        गाँव में माँ बे-हाल थी, क्यूंकि वह बिना बताये जो घर से गया था। वह दरवाजे पर ही निढ़ाल बैठी थी। दूर से गोपाल को आता देखा तो जैसे किसी मुरझाए वृक्ष में जान आ गई हो। दौड़ कर गले लगा लिया और रो पड़ी। कुछ देर बार संयत हो कर बहुत नाराज़ भी हुई कि उसे इस तरह नहीं जाना चाहिए था।
       वह भी शर्मिंदा था। उसने माँ को सारी  बात बताई और समझाई।
" माँ हम गाँव में दावत करेंगे ! "
" क्यों ! किसलिए ?"
" अब हम गरीब नहीं रहे। थैले में मनचाहे रूपये और हांडी से भरपूर भोजन पा सकते हैं। और अब मुझे कोई काम करने की भी जरूरत नहीं है। ऐश करेंगे ! "
" नहीं बेटा ! गरीब धन से नहीं , मन से होते हैं !  मेहनत की कमाई से जो सुकून मिलता है वही सच्चा ऐश है। जो तुम जादुई सामान लाये हो उनसे हम दावत नहीं करेंगे बल्कि उनको हम वापस देकर आएंगे। "
" क्यों माँ ! यह तो मुझे भूतों ने उपहार में दिए हैं। "
" ऐसे उपहार किस काम के जो हमें नाकारा बना दे। और सोचो अगर गाँव में किसी को पता चलेगा तो विश्वास कौन करेगा ? लोग तो यही कहेंगे ना कि जरूर ही ये कोई चोरी-डकैती करते होंगे ? "
" हां माँ ! ये तो मैंने सोचा ही नहीं था ! "
" हम लोग थैले से उतना ही रूपया लेंगे, जितने में हमारे घर की छत की मरम्मत हो जाये और खेत के लिए बीज खरीद सकें। "
     माँ की बात सही भी थी। गोपाल मान गया। उन्होंने थैले से जरूरत भर के  कुछ रूपये लिए और सारा सामान भूतों को लौटाने चल दिए। भूत भी माँ की बात और सोच से बहुत प्रसन्न थे। माँ ने उन भूतों को यह वचन भी दिया कि जो रूपये उन्होंने थैले से लिए हैं वे एक तरह से क़र्ज़ है और यह क़र्ज़ वह किसी जरूरतमंद की सहायता करके चुका दिया करेगी ताकि किसी और माँ  बच्चे से बिछुड़ना ना पड़े। गोपाल और उसकी माँ ख़ुशी-ख़ुशी घर की और चल दिए।


उपासना सियाग



        

शुक्रवार, 24 जून 2016

रुनकु की सूझबूझ

    " रुनकु पढ़ ले ! "
रुनक के कमरे से बाहर निकलते ही भोलू चिल्ला उठा, और घर के सभी लोग हंस पड़े। रुनक को भी हंसी आ गई। वह दौड़ कर भोलू के पिंजरे के पास जा पहुंची। हँसते हुए बोली, " भोलू मिट्ठू, छुट्टियों में कोई पढता है क्या ? " आज तो मैं नानी के पास जा रही हूँ।वहां बहुत मज़े करुँगी और पढाई से भी छुट्टी ..... "
    रुनक को पढाई से ज्यादा शरारतों और खेल में रूचि अधिक है। अक्सर उसकी माँ उसे डांटते हुए कहती रहती है तो भोलू भी सीख गया। जैसे ही वह दिखती है एक बार तो कह ही उठता है कि 'रुनकु पढ़ ले '.....
    घर वालों को भी बहुत भाता है मिट्ठू का यूँ चहकना। दो महीने पहले बिल्ली के पंजे से बचा कर उसे पिंजरे में रख लिया गया था। तब से वह रुनक से बहुत हिल-मिल गया। वह भी उससे बतियाती रहती है।
         आज जब रुनक नानी के पास जा रही है तो थोड़ी उदास है कि भोलू बिना मन नहीं लगेगा। उसने उसे साथ ले जाने की थोड़ी सी जिद की थी। परन्तु गर्मी की वजह से मना कर दिया गया।
        रुनक, उसकी माँ और छोटा भाई ट्रैन में बैठ चुके हैं। पापा ने दोनों बच्चों को सख्त हिदायत दी है कि कोई शरारत ना करें। किसी अनजान का दिया हुआ कुछ ना ले और ना ही खाये। रुनक बोली , " पापा आप चिंता ना करें मैं माँ और भाई का ध्यान रखूंगी आप बस मेरे भोलू का ध्यान रखना। " उसके कहने के अंदाज  से माँ-पापा हंस पड़े।
     ट्रैन चल पड़ी। शाम को आठ बजे नानी का शहर आना था।
     रुनक को पढ़ने का बहुत शौक है  वह भी कोई बाल पत्रिका के कर पढ़ने लगी। दोपहर का समय था। खाना खाया हुआ था सभी ऊंघ रहे थे। भाई भी माँ की गोद में सो गया था।
          लगभग चार बजे गाड़ी एक स्टेशन पर रुकी। वहां कुछ यात्री उतरे। कुछ चढ़े भी। एक व्यक्ति उनके डिब्बे में उनके सामने वाली खाली सीट पर आ कर बैठ गया। यहाँ -वहां का जायजा लेने लगा। फिर जोर से हुंकार लगाई।
  " जय बजरंग बली ! जय-जय श्री राम !! "
जोर की हुंकार से लगभग सभी की नींद खुल गई। सबके चेहरे पर खीझ/परेशानी झलक रही थी । थोड़ी देर बाद उसने अपने बैग से एक डिब्बा निकाला। खोल कर सबकेआगे करने लगा कि बजरंगबली ने उसकी बहुत बड़ी मन्नत पूरी की है तो उसने यह प्रसाद चढ़ाया है।सभी हिचक रहे थे। आज -कल प्रसाद में नशीली चीज मिला कर लूट लेने  वारदातें बहुत होती है तो सभी सावधान भी थे। वह आदमी कुछ मायूस सा हो गया।
      उसने कहा ,यह सच है कि आज कल जमाना खराब है। किसी पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन मैं ऐसा नहीं हूँ। सच्चा भक्त हूँ बाबा का। प्रसाद तो जितना बांटा जाये उतना ही अच्छा होता है इसलिए मैं आप सभी को बाँट रहा हूँ। अब मैं आप सब के सामने प्रसाद खा कर दिखाता हूँ।"
        उसने दो पेड़े उठा कर खा लिए। उसके खाने पर लोगों को भी विश्वास हो गया और सबने प्रसाद ले लिया। रुनक बहुत ध्यान से देख रही थी। प्रसाद वाले डिब्बे को दो भागों में बांटा गया था। दोनों हिस्सों में पेड़े रखे हुए थे। लेकिन एक तरफ तो सादे सफ़ेद रंग के पेड़े रखे  थे और दूसरे हिस्से के पेड़ों पर इलाईची के दाने लगे हुए थे। उस व्यक्ति ने खुद तो सादे वाले ही खाये थे और बाकी यात्रियों को इलाईची वाले पेड़े खुद अपने हाथों से ही दिए थे। वह सोच में पड़ गई। उसकी माँ ने तो तीनो का प्रसाद ले कर एक कागज में लपेट कर पर्स में रख लिया। और यात्रियों ने भी लगभग ऐसा ही किया।क्यूंकि विश्वास अब भी नहीं था और बात प्रसाद की थी तो इंकार भी नहीं कर सके। कुछ ने खा लिया।
           रुनक ने अपनी माँ को कान में बताया ," माँ ! बाबा जी गड़बड़ है !"
       " गड़बड़ है ! क्या ? "
    " बाबा जी के प्रसाद के  डिब्बे में दो तरह के पेड़े हैं। उन्होंने खुद तो सादे वाले खाये हैं और हमें इलाईची लगे हुए पेड़े दिए हैं। "
    " अोह , ऐसा है क्या ? अब क्या करें ......."
कहते हुए माँ तो चिंता में पड़ गई। फिर कुछ सोच कर उस व्यक्ति से बोली , भाई जी, थोड़ा प्रसाद और दीजिये। बजरंग बली का प्रसाद है , मेरे मायके में भी सबको दूंगी। "
     "  बिटिया ये तो यहीं खा लो, खोये का बना है खराब हो जायेगा । "
  " आप चिंता मत कीजिये, शाम तक खराब नहीं होगा।"
" अच्छा बहन ये लो तुम और प्रसाद लो। " डिब्बा खोल कर व्यक्ति ने इलाईची लगे पेड़े देने लगा।
" जरा रुकिए भाई जी ! यहाँ दो तरह के पेड़े रखे हैं। "
" हां तो क्या हुआ !हलवाई ने ऐसे ही बनाए होंगे। "
" फिर आपने खुद सफ़ेद वाले और सबको इलाईची लगे पेड़े क्यों दिए ?"
" अरे बहन शक की भी हद होती है ! " वह नाराज सा होने लगा। अब तो सभी यात्रियों ने अपने पेड़े सम्भाले। जिन्होंने खा लिए थे वो उनींदे से हो रहे थे। उनको भी रुनक की माँ की बात सही लगी। उनमे से एक यात्री बोला ," भाई नाराज क्यों हो रहा है। एक इलाईची वाला पेड़ा तूँ भी खा ले। सबको विश्वास हो जायेगा कि तू गलत नहीं है। "
      वह व्यक्ति बगलें झाँकने लगा और उठ कर जाने के लिए यहाँ -वहां ताकने लगा।अब तक तो सब समझ गए कि ये तो  गड़बड़ बाबाजी ही हैं। उसे वहीं घेर के बैठ गए।
   " बहनजी आपकी सूझबूझ ने हमें  ऐसे शातिर बदमाश की जालसाजी से बचा लिया। "
" यह मेरी नहीं मेरी बिटिया रुनकु की सूझबूझ है इसी ने मुझे बताया। " रुनक की बहुत तारीफ हो रही थी कि आजकल के बच्चे बहुत समझदार होते हैं। इनकी बहुत पैनी नज़र होती है। माँ को बहुत गर्व महसूस हो रहा था। अगले स्टेशन पर उस तथाकथित बाबा जी को पकड़वा दिया गया ।

उपासना सियाग 

गुरुवार, 10 मार्च 2016

जो पढ़ो वह गुनो भी..

     सर्दियों की छुट्टियां होने से पहले सभी शिक्षकों की मीटिंग बुलाई गई। मीटिंग में प्रधानाध्यापक जी बोले कि इस  बार छुट्टियों में बच्चों को पाठ्य पुस्तकों का गृह कार्य ना दे कर कोई रचनात्मक कार्य दिया जाये। एक जनवरी से सात जनवरी तक सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाया जाता है। ऐसे में बच्चों को इस बारे में कुछ सामग्री एकत्रित करके लाने को कहा जाये। जैसे, कविता, कहानी, चार्ट  या सुरक्षा के नियमों की जानकारी आदि कुछ भी, जिस से बच्चों को सही जानकारी मिले और भविष्य में सावधानी भी रख सकें। सभी को यह प्रस्ताव बहुत अच्छा लगा।
        स्कूल की छुट्टी होने से पहले आखिरी के दो पीरियड में क्रिसमस मनाने के लिए बच्चे सभागार में एकत्रित हुए तो उनको  जानकारी दी और सभी बच्चों के लिए यह अनिवार्य है। बच्चे खुश थे कि उबाऊ होमवर्क से तो छुटकारा मिला। अब स्कूल दो जनवरी को लगना था।
        टुनिया घर पहुँचते ही दादा जी के पास पहुंची।
     " अरे, आगई मेरी सोन चिरैया !"
    " हाँ जी दादा जी। "
" छुट्टियाँ हो गई होगी अब तो !"
    " हो गई, दादा जी ! एक ख़ुशी की बात है कि इस बार होमवर्क नहीं मिला !"
" बहुत अच्छी बात है बिटिया, दूसरी कक्षा में पढ़ती हो और इतना सारा पढाई का बोझा !" दादी ने कहते हुए अपने दोनों हाथ फैला दिए। टुनिया भाग के दादी की गोद में चढ़ गई।
" अच्छा ! होमवर्क नहीं दिया तो क्या कहा है ? छुट्टियों में कोई विशेष करने को कहा है क्या ?"
" मालूम नहीं दादा जी, ये देखिये डायरी, इसमें ही कुछ लिखा है। "
" ओह्हो ! यह तो बहुत अच्छा काम दिया है ! सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाने के लिए कोई सामग्री तैयार कर के लानी है। सड़क पर चलते तो सभी है लेकिन चलने के नियम किसी को पता है या नहीं कौन जानता है। ऐसी बातें बच्चों को स्कूल के समय से ही मालूम होना चाहिए बल्कि मैं तो कहता हूँ कि हर स्कूल में एक सप्ताह में ऐसा ही पीरियड होना चाहिए जिस से बच्चों को सड़को पर चलने के नियम पता हो, देश के प्रति उनके नैतिक दायित्व क्या है!"
" आप को तो भाषण देने की आदत है, मौका मिलना चाहिए !"
" यह भाषण नहीं है ! यह जिम्मेदारी है हम सबकी और हर कोई ही यह भूले हुए है !"
  " अच्छा चलो टुनिया तुम खेलो। मैं तुम्हें एक कविता सिखाऊंगा। "
         छुट्टियाँ बहुत मज़े से बीत गई। छुट्टी के बाद स्कूल का पहला दिन और नए साल का भी पहला दिन। बच्चों से अगले दिन अपने -अपने कार्य के साथ आने  गया।
        हॉल में चार्ट सजा दिए गए थे। एक तरह से प्रदर्शनी सी लगी थी। स्टेज़ पर प्रधानाध्यापक जी और सभी शिक्षक बैठे थे। बच्चे एक -एक कर के अपने विचार  कहानियां, लेख और कवितायेँ सुना रहे थे। टुनिया की बारी आने वाली थी। उसका दिल धक् -धक् कर रहा था। कुछ ही देर में निहारिका नाम पुकारा गया। यह टुनिया का स्कूल में  नाम था।वह  स्टेज पर खड़े हो कर एक बार तो सहम सी गई। फिर दादा जी की बात याद आई कि जब माईक के आगे खड़ी होगी तो एक बार तो घबराहट जरूर होगी, क्यूंकि यह पहली बार है।  तब उसे यह सोचना चाहिए की वह अपने घर में ही है और अपने परिवार लोगों को सुना रही है।  यही किया उसने। सबको अभिवादन कर के अपनी कविता सुनाने लगी।
               " जब भी तुमको पैदल चलना
                 बीच सड़क पर कभी ना चलना।
 
                 सड़क किनारे बनी जो पगडण्डी
                 उसी पर रखना अपनी हदबंदी।

                पार सड़क पर जब भी जाना
                 दायें -बाएं नज़र दौड़ा कर
                 जेब्रा क्रॉसिंग पर ही चलना। "

          टुनिया की छोटी सी लेकिन सीख भरी कविता पर देर तक तालियां बजती रही। फिर अध्यापकों ने भी विचार रखे बच्चों को समझाया की किस तरह से सुरक्षित रहें। अंत में प्रधानाध्यापक जी ने सभी के प्रयासों की सराहना की। यह कोई प्रतियोगिता तो थी नहीं कि किसी एक को सर्वश्रेष्ठ ठहराया जाता।  ज्ञानवर्धक और शिक्षाप्रद कार्यक्रम था जो कि बच्चों को जागरूक करने के लिए आयोजित किया गया था। सफल भी रहा या नहीं यह नहीं कहा जा सकता। क्यूंकि जब तक किसी ज्ञान को अपने जीवन में क्रियान्वित ना किया जाये वह अधूरा ही रहेगा।
          शाम को टुनिया दादा जी के साथ पास के पार्क में जाने को तैयार हुई। चलते -चलते दादा जी की ऊँगली छुड़ा कर सड़क पर भागते हुए अपने दोनों हाथ जैसे हवा में उड़ाते हुए अपनी कविता गाने लगी कि सामने से एक कार  उसे बचाते हुए करीब से गुजर गई। दादा जी ने खींच कर गले लगा लिया। एक बार तो कलेजा मुहँ को हो आया था। दादा जी ने समझ लिया की टुनिया ने कविता सिर्फ याद की है अभी समझी नहीं है। उन्होंने निश्चय किया कि  आज वह टुनिया को समझायेंगे भी कि जो पढ़ो वह गुनो भी। उसका हाथ अच्छे से पकड़ कर पार्क की ओर चल पड़े।

उपासना सियाग ( अबोहर )